मौर्यकाल में भारत के मध्य एशिया से व्यापारिक संबंध

मौर्यकाल में व्यापार व्यवस्था (Trade system in Mauryan Period)
विदेशी व्यापार के लिए स्थल मार्ग मुख्य रूप से तीन थे
(1) काबुल नदी से हिन्दूकुश पर्वत होकर पश्चिम में आक्सस नदी से काला सागर तक जाता था। इसमें प्रमुख स्थल थे तक्षशिला, काबुल और बैक्ट्रिया।
(2) भारत और एकबाथना के बीच का मार्ग कान्धार से हीरित, फारस तथा इराक होकर एशियामाइनर तक जाता था।
(3) भारत से सेल्यूसिया का मार्ग मकरान होकर पाश्चात्य विश्व की ओर पर्शियन खाड़ी और टिग्रीस नदी होकर जाता था।
जल मार्ग भी कई थे। एक जल मार्ग लाल सागर होकर मिस्र तक जाता था। यहीं एलेजेण्ड्रिया का बन्दरगाह था जहाँ भारत का माल एकत्रित कर पश्चिमी देशों को भेजा जाता था। इसको प्रशस्त करने के लिए टालमी फिलेडेल्फस ने (टालमी प्रथम का पुत्र) आज की स्वेज नहर के ही स्थान पर आर्सिओने से लाल सागर तक एक नहर की योजना बनायी थी, जो पूर्ण नहीं हो सकी। यह सिद्ध करता है कि लाल सागर होकर एक प्रमुख व्यापारिक जल मार्ग था। इस नहर के विकल्प में टालमी फिलेडेल्फस ने लाल सागर के पश्चिम तट पर भारत का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र वेरेनिस नाम का एक नया नगर बसाया। । व्यापार में पण्याध्यक्ष नामक अधिकारी विशेष जागरूक था। वह वस्तुओं के निर्यात के पूर्व वस्तु का उत्पादन, कीमत, लाभ मात्रा आदि विविध पक्षों पर विचार के बाद ही निर्यात का निर्णय लेता था। घाटे का व्यापार नहीं किया जाता था। जिस माल के निर्यात का निश्चय किया जाता था उसके व्यापारियों को राज्य की ओर से सभी यथोचित सहायता दी जाती थी। विदेशी व्यापारी देश में बराबर जमे रहते थे। आयात पर भी इसी का निर्णय होता था। यदि आयातीति माल महंगा पड़ता तो आवश्यक होने पर उसके लिए चुंगी में छूट दी जाती थी। इस प्रकार इसका मुख्य कार्य था-सामानों की शुद्धता की जांच, उन्हें इकट्ठा करना, कीमत का निर्धारण और निरीक्षण, जनता के हितार्थ लाभ तय करना तथा बाह्य व्यापारियों द्वारा शुल्क जमा कराना आदि। इसके अतिरिक्त अन्य अधिकारी था शुल्काध्यक्ष। यह नगर द्वार पर रहता था। उसका काम था वहाँ सामानों की जाँच करना, उसका ब्यौरा रखना, धोखा देने वाले को दण्ड देना, बिक्री कर का भुगतान लेना, वर्जित सामानों के निर्यात पर नियंत्रण रखना आदि। खानाध्यक्ष, कोष्ठाध्यक्ष, नाताध्यक्ष, संस्थाध्यक्ष (बाजार नियंत्रक) भी थे। व्यापार की व्यवस्था के लिए ग्रामभोजक, पुलिस, समाहर्ता और प्रदेष्टा अपने-अपने क्षेत्र में सुरक्षा के उत्तरदायी होते थे। नगर की व्यवस्था के लिए समिति गठित थी उसका एक भाग विदेशी व्यापारियों के विषय में जानकारी रखता था।
चूँकि सिकन्दर के आक्रमण के कारण पश्चिमी विश्व का भारत से सम्बन्ध अधिक घनिष्ठ हो गया था क्योंकि मिस्र, सीरिया, मैसिडोनिया आदि देशों के राजदूत भारत आकर रहने लगे थे। इस राजनीतिक सम्पर्क ने भारत का व्यापारिक सम्पर्क बढ़ाया तथा नए देशों से जोड़ा। इसमें दूसरा योगदान मिस्र का था जिसके शासक टालमी द्वितीय फिलाडेल्फस ने स्वेज नहर खोलकर भारत के व्यापारिक मार्ग को और प्रशस्त बना दिया।
भारतीय-यूनानी व्यापार का ज्ञान यूनानी राजदूत मेगस्थानी से होता है जो भारतीय शासक के दरबार में रहता था। पैट्रिकल तथा पोलिवियस भी इस सम्बन्ध में चर्चा करते हैं। मिस्र में भारत मसाले का व्यापार करता था। ऊँटों पर भारतीय मसाले वहाँ भेजे जाते थे और इनके अतिरिक्त भारत से बहुमूल्य पाषाण भी भेजा जाता था। सम्राट टालमी का ‘याट का सैलून' भी भारतीय पाषाण का निर्मित था। भारत से पशु, गाड़ियाँ तथा अन्य वस्तुएँ भी मिस्र के बाजारों में विक्रय के लिए जाती थी। यह व्यापारिक सम्पर्क का ही परिणाम था कि मिस्र के शासक टालमी फिलाडेल्फस ने भारतीय शासक बिन्दुसार के दरबार में डायोमीसियस नामक राजदूत भेजा था। अशोक के अभिलेखों से ज्ञात होता है। कि अन्य देशों के साथ मिस्र से भारत के लिए औषधियों तथा जड़ी-बूटियों का आयात करता था। सीरिया से भी इस समय व्यापारिक सम्पर्क था तभी बिन्दुसार के शासन काल
67 में सीरिया के शासक एण्टीओकस ने अपने राजदूत डायामेकस को उसके दरबार में भेजा था। यहां से बिन्दुसार ने अंजीर, मदिरा और दार्शनिकों की माँग की थी जिसका उत्तर मिला था कि अंजीर और शराब तो सीरिया से भारत को भेजा जा सकता है पर दार्शनिकों को नहीं भेजा जा सकता।
भारतीय व्यापार मध्य एशिया से भी था। इस समय अनेक मध्य एशियायी नगरों में भारत का उद्योग स्थापित हो गया। भारतीय भी वहां बड़ी संख्या में बस गये थे । वहाँ का प्रमुख व्यापारिक केन्द्र काशगर था। इसका कारण था कि चीन से पश्चिमी विश्व को जाने वाले मार्ग पर यह बसा था जहाँ से भारत से भी सीधा रास्ता आता था। चीन और भारत के बीच व्यापारिक सम्पर्क का ज्ञान कौटिल्य के अर्थशास्त्र से मिलता है। चिनपट्ट (चीनी रेशम) शब्द का उल्लेख कई बार हुआ है। अतएवं चीन से रेशमी वस्त्र का आयात भारत में होता होगा। सूती वस्त्र सिन्धु में तैयार होता था जहाँ से मध्य एशियाई देशों को भेजा जाता था। भारत तथा मध्य एशियाई सामग्रियों के व्यापार के प्रमुख केन्द्र काशगर से चीन जाने का भी सीधा मार्ग था । चीन के कुछ व्यापारी दक्षिण भारत में आते थे। वे अपने साथ रेशमी वस्त्र, स्वर्ण और चाँदी ले आते थे और बदले में सीप, मोती तथा बहुमूल्य पत्थर अपने देश को भेजते थे। यह व्यापार स्थलमार्ग से ही होता था क्योंकि चीन के व्यापारी नौका निर्माण में कुशल नहीं थे। तभी फाहियान, ह्वेनसांग, इतिसिंग आदि चीनी यात्री प्राय: पश्चिम के ही स्थल मार्ग द्वारा भारत भूमि में प्रविष्ट हुये।
भारत और लंका का भी सम्पर्क था। अशोक ने लंका के साथ धार्मिक सम्बन्ध स्थापित किया था। वहाँ उसने अपने पुत्र महेन्द्र तथा पुत्री संघमित्रा को धर्म प्रचारार्थ भेजा था। अर्थशास्त्र से भारत का व्यापार लंका से ज्ञात होता है। सम्भव है कि आर्थिक सम्पर्क के कारण ही धार्मिक सम्पर्क भी स्थापित हुआ होगा। कौटिल्य के अनुसार तमिल प्रदेश, सिकंदरिया (अलसंग), वर्मा (सुवर्ण भूमि), पूर्वी द्वीप समूह (पारलौहित्य ब्रह्मपुत्र नदी के पार का भाग) आदि से भी भारत का व्यापार होता था।
डॉ. घोषाल के अनुसार राज्य नियंत्रित उद्योग इस समय नहीं था। पर यह मान्य नहीं प्रतीत होता क्योंकि कुछ उद्योग तो पूर्ण राज्य नियंत्रण में थे जैसे शस्त्रास्त्र उद्योग। भले ही सभी उद्योग स्वतंत्र थे पर वे राज्य नियंत्रण और नियम से आबद्ध थे। राजा का उनमें हस्तक्षेप होता था। पर जी. एल. आध्या के अनुसार इस प्रकार का नियंत्रण बहुत दिनों तक नहीं बना रह सका।।

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