उत्तरी भारत के सामाजिक जीवन

छठी शताब्दी ई.पू. में सामाजिक जीवन–भारत का सामाजिक जीवन अनेक प्रकार के परिवर्तनों का मुकाबला करता हुआ एवं परिस्थितियों से अपने आपको समायोजित करता हुआ निर्बाध गति से बढ़ता चला आ रहा था। भारतीय समाज की मुख्य आधार शिला वर्ण व्यवस्था थी वैदिक काल में भारतीय समाज चार वर्षों में विभक्त हो गया था। समाज का यह विभाजन आरम्भ में कर्म पर आधारित था । ये वर्ण थे- ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र । । वर्ण व्यवस्था- ब्राह्मण वर्ण धार्मिक कृत्यों को सम्पन्न कराता था। इस वर्ग का काम था पठन पाठन एवं धार्मिक क्रिया- कलापों का संचालन, सम्पादन । क्षत्रिय वर्ग के लोगों का कार्य नागरिकों की रक्षा करना, आक्रमणकारियों से युद्ध करना और सम्पूर्ण समाज की धन सम्पत्ति की रक्षा करना था। वैश्य वर्ग के लोग कृषि- व्यापार आदि में संलग्न रह राज्य को समृद्ध करने में योग देते थे । चतुर्थ वर्ग शूद्रों का था जो निम्न कोटि के कार्य एवं सेवा कार्य करते थे।यह वर्ग केवल कार्य विभाजन के लिए ही था । वास्तव में आर्यों का पूरा समाज एक ही वर्ग जैसा था एक ही परिवार में एक सदस्य योद्धा, दूसरा पुरोहित एवं तीसरा सेवक हो सकता था इन सभी वर्गों में खान पान तथा वैवाहिक निकटतम सम्बंध थे, इस प्रकार आरम्भ में ऊंच नीच की भावना नहीं थी । यद्यपि शुरू में शूद्र उच्च वर्ग (द्विज) से पृथक थे लेकिन जैसे जैसे समय बीतता गया इन्हें भी हिन्दू समाज का अंग मान लिया गया था। लोगों को किसी भी वर्ग का कार्य सम्पादन करने की पूर्ण स्वतंत्रता थी । इस प्रकार वर्ण अपरिवर्तशील नहीं थे। शूद्र भी साधना से ऋषि बन सकता था। वाल्मीकी ऋषि इसके उदाहरण हैं अनेकों क्षत्रियों ने ब्राह्मत्व प्राप्त किया, राजा जनक अपने समय के उत्कट ब्रह्मज्ञानी थे । इसी प्रकार परशुराम ब्रह्मण से क्षत्रिय बन गये । वेदों में कई दृष्टान्त ऐसे देखने को मिलते हैं कि राजकन्या का विवाह किसी ब्राह्मण ऋषि के साथ सम्पन्न हो गया या किसी राजपुत्र ने वैश्य कन्या से विवाह कर लिया।

(i) कालान्तर में वर्ण व्यवस्था जटिल और प्रगाढ़ हो गई कार्य विभाजन के उद्देश्य को

छोड़कर वर्ण व्यवस्था ने जन्म पर आधारित जातिगत आधार ग्रहण कर लिया। जाति प्रथा का सहारा इसलिए लिया गया कि हिन्दू समाज आर्येत्तर नस्लों को ही

अपने में समेट लेना चाहता था। आर्यों ने इन को चतुर्वर्ण वृत्त में समेट लिया।

(ii) इसका परिणाम यह हुआ कि जाति व्यवस्था में कट्टरता आ गई तथा नियम कड़े हो गये ऊँचे व नीच का अन्तर बढ़ गया।

(iii) चतुर्थ वर्ग में आने वाली जातियों की हिन्दू होते हुए भी सामाजिक व आर्थिक स्थिति अतिदीन होने लगी।

(iv) जैसे जैसे समय गुजरता गया समाज में चार जातियों के स्थान पर अनेक उपजातियाँ हो गई । ब्राह्मण भी कई वर्षों में विभक्त हो गये ।



अंगुत्तर निकाय में ब्राह्मणों की श्रेणियों का वर्णन है जिसके अनुसार उनकी 5 श्रेणियां थीं।

(i) ब्रह्म सभा - इस श्रेणी के अन्तर्गत उच्च कोटि के ब्राह्मण विद्या व्यवसनी थे जो

ब्रह्मचारी रह विद्याध्ययन करते थे। इनका रक्त सात पीढ़ियों से शुद्ध होता था।

(ii) देव सभा - इस श्रेणी में भी उच्च कोटि के ब्राह्मण होते थे, रक्त की भी शुद्धता

होती थी लेकिन यह जीवन पर्यन्त अविवाहित नहीं रहते थे।

(iii) मर्यादा - इस श्रेणी में अधिकांशतः ग्रहस्थ होते थे तथा अपने कुल की मर्यादा | का भी ध्यान रखते थे ।

(iv) सम्भिन्न मर्यादा - इस श्रेणी में निम्न कोटि के ब्राह्मणों को सम्मिलित किया जाता

है। इस श्रेणी के ब्राह्मण अन्तरजातीय विवाह कर लेते थे तथा जो अपने कुल की ।

मर्यादा का भी ध्यान नहीं रखते थे।

(y) ब्राह्मण चांडाल - इस श्रेणी के ब्राह्मण वर्णाश्रम धर्म का पालन न करने वाले एवं

| नीच कर्म करने वाले होते थे।

(v) धर्म की प्रक्रियाएं जटिल हो जाने से समाज में ब्राह्मणों की प्रस्थिति में विशेष उन्नति

हुई उनका महत्त्व अधिक बढ़ गया लेकिन क्षत्रिय ब्राह्मणों के इस आतंक को सहन न कर सके। उनमें ब्राह्मणों के प्रति विद्रोह की भावना उत्पन्न हुई तथा उन्होंने त्याग तपस्या का उदाहरण प्रस्तुत कर लोहे को लोहे से काटा । बुद्ध तथा महावीर क्षत्रिय राजकुमारों ने ब्राह्मणों की उच्चता एवं ऊँच नीच की भावना का तीव्र विरोध किया। ब्राह्मणों की तरह क्षत्रियों ने भी उच्च कोटि की विद्या अर्जित की । दो क्षत्रीय आलार कालाम तथा रुद्रक रामपुत्र उच्च कोटि के योगी थे। बौद्ध संघ में सभी जाति के लोग सम्मिलित हो सकते थे ।

(vi) समाज में क्षत्रियों के सम्मान में वृद्धि हुई और इन्हें ब्राह्मणों की अपेक्षा उच्च समझा जाने लगा । क्षत्रिय वर्ग को बौद्ध एवं जैन साहित्य में सबसे ऊंचा वर्ग माना गया। जैसा कि उस समय की एक कथा प्रचलित है कि महावीर स्वामी का जन्म एक ब्राह्मणी के गर्भ से होने वाला था लेकिन उन्होंने क्षत्रिय रानी के गर्भ से जन्म लेना

श्रेष्ठ समझा ।।

(vii) समाज में वैश्यों की दशा भी सम्मान युक्त बन रही थी। उन्हें सेठ, धनवान, महाजन, आदि नामों से जाना जाता था। ये लोग कृषि और व्यापार करते थे। वैश्यों

में भी कई वर्ग तथा उपजातियाँ बन गई।

(viii) समाज में दास प्रथा प्रचलित थी। उनके साथ उदारता का व्यवहार किया जाता था । सामान्यत: वे अपने स्वामी के लिए कार्य करते थे और प्रतिफल के रूप में उन्हें भोजन एवं वस्त्र मुफ्त प्राप्त होता था।

(ix) समाज में परिवार सम्मिलित रूप से रहते थे। परिवार का सबसे बड़ा पुरुष परिवार का मुखिया तथा बड़ा पुत्र उत्तराधिकारी होता था। परिस्थिति के अनुसार परिवार की सम्पत्ति समान हिस्सों में विभक्त कर दी जाती थी।



स्त्रियों की दशा - वैदिक काल में स्त्रियों का स्थान अत्यन्त सम्मान जनक था स्त्रियों के अधिकार पुरुषों के बराबर थे, वह यज्ञ में अपने पति के साथ बैठकर धार्मिक कृत्य में भाग लेती थी इस तरह जो सम्मान वैदिक काल में स्त्रियों को मिला था वह धीरे धीरे घटता जा रहा था तथा उसका प्रमुख कार्य परिवार संभालना एवं वंश वृद्धि ही थी । पुत्र का महत्त्व कन्या की अपेक्षा अधिक था पुत्र जन्म को सुख वृद्धि का प्रतीक माना जाता था और पुत्री का जन्म विपत्ति सूचक समझा जाता था।

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