ईसा पूर्व छठी शताब्दी सामाजिक धार्मिक जीवन

विद्याग्रहण की, आध्यात्म एवं योग का अभ्यास किया तथा धार्मिक जीवन को एक नई गति दी। गुरु क्षत्रियकुमार आलार कालाम जो कि महात्मा बुद्ध के गुरु थे वह उच्च कोटि के योगी थे। इनके पूर्व राजा जनक स्वयं उच्च कोटि के ब्रह्मज्ञानी थे। छठी शताब्दी पूर्व में क्षत्रिय स्वयं को ब्रह्मणों से उच्च समझने लगे, जैन धर्म के ग्रंथों में भी प्रचार किया कि तीर्थंकर केवल ब्राह्मण और हिंदू आचार्य उनकी मधुर ओजस्वी वाणी से सम्मोहित हो जाते थे। वे सदाचारी, चरित्रवान, संयमी और सहदय व्यक्ति थे । उनका स्वयं का पवित्र जीवन लोगों में उन्नत जीवन की प्रेरणा देता था। ऐसे महान् व्यक्तित्व के धर्म को अंगीकार करने में लोगों की रुचि बढ़ना स्वाभाविक ही था। उनके व्यक्तित्व ने राजाओं, राजकुमारों, ब्राह्मणों और जन साधारण को सामान रूप से प्रभावित किया।
(5) राजाओं का संरक्षण - बौद्ध धर्म की प्रगति का एक कारण उसको राजाओं का संरक्षण प्राप्त होना भी था। महात्मा बुद्ध का जन्म एक राज घराने में हुआ था। अत: अन्य राज्यों के क्षत्रिय शासकों को उनके द्वारा प्रचारित धर्म के लिए सहानुभूति होना स्वाभाविक ही था । बुद्ध के जीवन काल में ही अनेक राजाओं और गणराज्यों के शासकों ने बुद्ध धर्म में दक्षिा ले ली थी । अजात शत्रु, प्रसेनजित और मगध सम्राट बिम्बिसार बौद्ध धर्म के अनुयायी बन गये थे । इन राजाओं ने मुक्त हस्त से बौद्ध धर्म के प्रसार में आर्थिक और शासकीय सहायता दी । बुद्ध की मृत्यु के बाद हर्ष, अशोक और कनिष्क जैसे महान् सम्राटों ने बौद्ध धर्म को अपना राज्य धर्म ही नहीं बनाया वरन् विदेशों में भी उसका प्रसार किया अशोक ने इस धर्म के प्रचार के लिए अपने पुत्र महेन्द्र और पुत्री संघमित्रा को भिक्षु बनाकर लंका भेजा । उसने बौद्ध धर्म के मुख्य सिद्धांतों को चट्टानों तथा स्तम्भों पर खुदवाकर देश के विभिन्न भागों में उनकी स्थापना की ताकि सामान्य लोगों में उसका प्रचार हो । मलिन्द और पालवंशी राजाओं ने इस धर्म के प्रसार में महत्त्वपूर्ण योगदान दिया । बहुत से शासकों ने बौद्ध भिक्षुओं के लिए बिहारों का निर्माण किया जिनमें लाखों की संख्या में बौद्ध भिक्षु धर्म सिद्धांतों का अध्ययन मनन करते थे।
(6) संघ की व्यवस्था उत्कृष्टता- बौद्ध धर्म के स्थायित्व के लिए महात्मा बुद्ध ने एक सुव्यवस्थित, सुचालित संघ व्यवस्था की । वे जानते थे कि एक सुदृढ़ संगठन के अभाव में किसी भी धर्म का लम्बे समय तक टिकना असम्भव है। भिक्षुओं के रहने के लिए उन्होंने अपने धनी शिष्यों की सहायता से बहुत से मठों का निर्माण कराया। भिक्षुओं के लिए संघ की व्यवस्था की । संघ का संगठन प्रजातन्त्रात्मक आधार पर हुआ बौद्ध संघ विद्या और ज्ञान के प्रमुख केंद्र थे। हजार-लाख की संख्या में भिक्षु उनमें दीक्षा लेकर प्रवेश लेते थे और प्रचारक बनकर बौद्ध धर्म का संदेश देश विदेशों में पहुँचाते थे । भिक्षुओं को बुद्ध का आदेश था- 'ऐ भिक्षुओं । जाओ और घूमो अधिक से अधिक लोगों को लाभ पहुँचाओ, उनका कल्याण करो, उनके ऊपर महती सहायता रखो ।' भिक्षुओं को हिदायत थी कि केवल-चातुर्मास को छोड़कर वे वर्ष पर्यन्त भ्रमण करते रहें । बौद्ध कालीन भारत में नागार्जुन, वसुबन्ध, आर्यदेव, दिङनाग और धर्मकीर्ति जैसे विद्वान इन्हीं संघों की देन थे। | (7) अन्य प्रतिस्पर्धी धर्मों का अभाव - बौद्ध धर्म के अभ्युदय काल में इसे किसी अन्य प्रतिस्पर्धी धर्म से मुकाबला नहीं करना पड़ा। इनका मात्र प्रतिस्पर्धी धर्म हिंदू धर्म था किंतु इस धर्म के संगठित प्रचारक नहीं थे । इसके अतिरिक्त हिंदू धर्म की विद्रूपताओं से लोगों का मन उचटता-सा जा रहा था । इस्लाम, ईसाई या अन्य किसी धर्म को देश में प्रवेश इस समय तक नहीं हो पाया था। इस लिये प्रतिस्पर्धी धर्म के अभाव में बोद्ध धर्म को पनपने में देर नहीं लगी।
(8) बौद्ध धर्म का लचीलापन - बौध धर्म के सिद्धांतों में जटिलता नहीं थी यह इतना लचीला था कि देश काल और स्थिति के अनुसार किसी भी देश में सरलता से खप गया। इसके सिद्धांतों में से अधिकांश सार्वभौमिक थे । सत्य बोलना, हिंसा न करना, चोरी न करना, सत्य भाषण करना, कदाचार में न पड़ना आदि उपदेश न केवल बुद्ध के उपदेश थे वरन् अन्य धर्मों के प्रवर्तकों ने भी अपने-अपने धर्मों में इनका समावेश किया था। अतः सिद्धांतों की सार्वभौमिकता के कारण इसके प्रचार को न चीन व जापान में रुकावट हुई और न आसाम और तिब्बत में ।।
(9) हिन्दू धर्म की बुराइयाँ - बौद्ध धर्म के प्रादुर्भाव के समय में हिंदू धर्म में अनेक बुराइयाँ पैदा हो गई थीं। वैदिक धर्म में ब्राह्मणों, पुरोहितों का वर्चस्व था । इन्होंने अपने क्षुद्र स्वार्थों के वशीभूत हो वैदिक धर्म को जटिल एवं कर्मकाण्डी बना दिया। अब यज्ञ घर-घर की वस्तु न रहकर खर्चीले समारोह की श्रेणी में आ गये । सामान्यजन में उनको आयोजित करने की क्षमता नहीं रही। इसके अतिरिक्त बिना पुरोहितों की उपस्थिति के यज्ञ किये नहीं जा सकते थे । क्योंकि उनकी जटिल पद्धति से केवल वे ही अवगत थे। पुरोहितों को यथेष्ठ दान, दक्षिणा देना सबके बस की बात नहीं थी। जब महात्मा बुद्ध ने लोगों को बताया कि मोक्ष प्राप्ति के लिए यज्ञादि करने की आवश्यकता नहीं है, सुख शांति तो आभ्यंतर की वस्तु है तो लोग उनकी ओर अधिक आकर्षित हुए और उन्होंने उनके धर्म का सहर्ष स्वागत किया।
(10) बौद्ध संगीतियों का आयोजन - प्रत्येक धर्म में कालान्तर में कई कारणों से दोष उत्पन्न हो जाते हैं जिनका निराकरण करना आवश्यक होता है। बौद्ध धर्मावलम्बियों ने समय-समय पर बौद्ध संगीतियों का आयोजन कराया जिनमें अनेक भिक्षु और विचारक विद्वानों ने भाग लिया। इन संगीतियों में धर्म में प्रवेश कर लेने वाली बुराइयों पर खुलकर विचार-विमर्श होता था और उनको दूर करने के उपाय सोचे जाते थे। इसके कारण बहुत लम्बे समय तक बौद्ध धर्म की शुद्धता अक्षुण्ण बनी रही।
(11) रोचक शैली - महात्मा बुद्ध के प्रवचनों की शैली अत्यंत सरल और रोचक थी। वे मनोविज्ञान के तथ्य से अवगत थे। वे जानते थे कि गम्भीर और वजनी शैली लोगों को प्रभावित नहीं कर पायेगी अतः उन्होंने अपनी शैली रोचक और सरल रखी । पालि भाषा में रचित बौद्ध धर्म ग्रंथों के पारायण करने पर ज्ञात होता है उनमें उपमाओं और दृष्टांतों की भरमार है। गूढ़ से गूढ़ विचार को बुद्ध ने सरल भाषा में उदाहरण दे देकर लोगों को समझाने की चेष्टा की । इसलिए भी लोग उनके धर्म की तरह आकृष्ट हुए ।

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