ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तरी भारत के सामाजिक, आर्थिक, एवं सामाजिक धार्मिक जीवन

ग्राम - इस काल में ग्रामों की संख्या नगरों की तुलना में अधिक थी अधिकतर गाँवों में मकान मिट्टी के बने हुए कच्चे होते थे। गाँवों में सम्पूर्ण गाँव के पशुओं को चरने हेतु बड़ेबड़े सामूहिक चरागाह होते थे। गाँवों में कृषक व व्यापार करने वाले दोनों ही प्रकार के लोगों का निवास था। कुछ गांव ऐसे भी थे जहाँ समान व्यवसाय के लोग ही रहते थे । इस तरह ऐसे गाँवों का नामकरण सम्पन्न एवं प्रभावशाली व्यवसायी के नाम पर किया जाता था। कहीं कहीं सामूहिक नाम भी दे दिया जाता था ग्राम स्वायत्तशासी होते थे। आपसी विवादों का निपटारा पंचायतों के माध्यम से होता था। गांवों में सभी नागरिक सद्भाव का परिचय देते हुए जीवन यापन करते थे।
उद्योग धन्धे कृषि 600 ई. पू. में लोगों का मुख्य धन्धा कृषि था जो व्यक्ति कृषि करते थे और जिन खेतों पर खेती करते थे उनका उन खेतों पर अधिकार हो गया था। कृषक अपनी जमीन में अनाजों में गेहूं चावल आदि के अतिरिक्त दालें, तिलहन, कपास एवं मसाले आदि भी उगाते थे। फल के बगीचों की तरफ भी लोगों का आकर्षण था । इसलिए फलों के बगीचे लगाये जाते थे। जातक कथाओं में कई प्रकार के फलों एवं शाकों के नाम उल्लेखित हैं। इस काल में वनों को भी विकसित किया जाता था इन वनों को अटवी कहते थे । वन सघन थे। विभिन्न प्रकार की इमारती लकड़ियाँ भी इन वनों से प्राप्त की जा सकती थी।
भूमि कर कृषि आय के छठे भाग से 12 वें भाग तक लिया जाता था। इस काल में कृषि के साथ पशुपालन के व्यवसाय की तरफ भी विशेष ध्यान दिया जाता था। पशुपालन में लोग प्रमुखतया गाय, बैल और अश्वों को पालते थे । खच्चर और ऊंट भी रखते थे प्रायः प्रत्येक परिवार में गायें अनिवार्य रूप से रखी जाती थी । खेती में मुख्यतः बैल और घोड़े का प्रयोग होता था। कृषि से भूमिकर ग्राम सेवक द्वारा वसूल किया जाता था। कृषि एवं पशुपालन के अतिरिक्त अन्य व्यवसाय भी चलते थे । बौद्ध जातक कथाओं में 18 मुख्य व्यवसायों का उल्लेख मिलता है । बढ़ईगीरी (बर्धकी), मिट्टी के बर्तन बनाना, लुहारी, चमड़े का काम (चर्मकार) , स्वर्णकार, कपड़े बुनना हाथी दाँत का काम, माली, गन्धी (इत्र बनाना) आदि व्यवसायों के संचालन के लिए श्रेणियाँ होती थी । प्रत्येक श्रेणी में एक जैसा व्यवसाय करने करने वाले लोग संगठित होते थे। माल के उत्पादन एवं विक्रय का प्रबंध यह श्रेणियाँ ही करती थी। प्रत्येक श्रेणी की अपनी मोहरें होती थी श्रेणियों की इन मोहरों या सीलों को राजकीय मान्यता प्राप्त होती थी। प्रत्येक श्रेणी अपने निर्मित नियमों के अनतर्गत ही कार्यों का सम्पादन करती थीं, अपने अन्दरूनी झगड़ों का स्वयं के प्रयत्नों से ही हल कर लेती थी। श्रेणियाँ अपने सदस्यों के लिए बैंक का कार्य भी करती थी। प्रत्येक व्यवसाय से सम्बन्धित श्रेणी के मुखिया को ज्येष्ठक कहते थे। एक श्रेणी अर्थात् एक व्यवसाय विशेष का एक एक नगर बस जाता था जो कि औद्योगिक बस्तियों की तरह होती थी। श्रेणियाँ व्यवसाय से अनभिज्ञ लोगों को प्रशिक्षित करने का भी प्रबंध करती थी जिससे कि लोग व्यवसाय में प्रवम्श करने से पूर्व उस व्यवसाय के बारे में प्रशिक्षित होकर मात्रात्मक एवं गुणात्मक उत्पादन कर सकें ।
| व्यापार- 600 ई. पू. व्यापार उन्नत अवस्था में था। व्यापार के प्रसार हेतु व्यवसायी दूर दूर तक जाते थे । इन व्यापारियों को सेठ कहते थे। बड़े व्यवसायियों को महा सेठ तथा छोटे व्यापारियों का अनुश्रेष्ठिन या छोटे सेठ कहते थे । व्यापार जल थल दोनों ही मार्गों से होता था। स्थल व्यापार बैलगाड़ियों तथा खच्चरों के माध्यम से किया जाता था। जल मार्गों से व्यापार करने में नावों का प्रयोग किया जाता था । नावों द्वारा व्यवसायी स्वर्ण भूमि बेबिलोन एवं मिस्र तक जाते थे और अपने व्यापार को प्रसारित करने में तल्लीन थे। जल मार्गों से आवागमन हेतु बड़ी नावें भी होती थी जिनमें एक साथ 700 व्यक्ति यात्रा कर सकते थे । इस काल में व्यापार हेतु समृद्धशाली नगरों व बन्दरगाहों का निर्माण होता था। भडौच (मरुत्कच्छ) एक विख्यात व्यापारिक बन्दरगाह था । जहाँ से भारतीय व्यवसायी अपने उत्पादित माल को विभिन्न देशों को भेजते थे। इन बन्दरगाहों को सड़क यातायात से जोड़ा जाता था । छठी शताब्दी पूर्व में जातक कथाओं में कई महत्त्वपूर्ण व्यापारिक मार्गों के साक्ष्य मिलते हैं। ताम्राकप्ति, चम्पा, पाटलिपुत्र तथा वाराणसी व्यापारिक मार्गों से जुड़े हुए थे। इनमें से एक मार्ग काशी से भड़ौच तक जाता था एक अन्य मार्ग मथुरा से तक्षशिला एवं यहाँ से काबुल होता हुआ मध्य एशिया तक जाता था। इन मार्गों के साक्ष्य से प्रमाणित होता है कि भारतीय व्यवसायी अपने व्यापार के प्रसार हेतु दूर दूर तक जाते थे और दिनों दिन अपनी समृद्धि का प्रमाण प्रस्तुत कर रहे थे।
व्यापारी अपनी सुरक्षा हेतु सैकड़ों के ग्रुप में स्थल मार्ग पर यात्रा करते थे एवं जिन स्थानों का उन्हें ज्ञान नहीं था उनकी जानकारी हेतु अपने साथ मार्ग दर्शक ले जाते थे जिन्हें सार्थवाह कहते थे । जातक कथाओं में ऐसे विभिन्न काफिलों का वर्णन है। व्यापार वस्तु विनिमय एवं मुद्रा विनिमय दोनों ही प्रकार से होता था। मुद्रा विनिमय के अन्तर्गत सिक्के सोने चाँदी व ताँबे के होते थे । व्यापारिक श्रेणियाँ अपनी अपनी पहचान के लिए अपने अपने सिक्के चलाती थी और अपना चिन्ह देती थी। इस काल में प्रसिद्ध सिक्का “कार्षापण” था। उधार व्यापार हेतु पर्यों एवं हुडी का रिवाज चल पड़ा था। जातक कथाओं में यह भी उल्लेख है कि साझेदारी व्यापार की प्रथा भी थी। इसमें प्रत्येक साझेदार अपनी अपनी पूंजी के आधार पर लाभ का बँटवारा कर लेते थे। विदेशों से वस्त्र, हाथी दाँत की वस्तुएँ, सोने चाँदी के आभूषण एवं इत्र आदि का व्यापार होता था।
छठी शताब्दी ई. पू. में धार्मिक जीवन - छठी शताब्दी ई.पू. का काल धार्मिक दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण है। 600 ई.पू. में केवल भारत में ही नहीं वरन् समस्त एशिया महाद्वीप में एक प्रकार से धार्मिक आन्दोलन मुखरित हो उठे। इसी काल में चीन में कनफ्यूशियस, ईरान में जोरास्टर एवं जूड़िया व जसेमिया में पुरानी परम्पराओं के खिलाफ युद्ध छेड़ा गया । भारत में बौद्ध एवं जैन धार्मिक आन्दोलनों की शुरुआत हुई जिसने प्राचीन परम्पराओं पर कड़ा प्रहार कर एक नवीन परम्परा का सूत्रपात किया। | धार्मिक आन्दोलन के कारण- भारत में धार्मिक क्षेत्र में उथल पुथल कोई अचानक होने वाली घटना नहीं है। 

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