छठी शताब्दी ई. पू. में धार्मिक आन्दोलन

सैकड़ों वर्षों से व्यक्ति प्राचीन परम्पराओं में परिवर्तन करने के लिए दृढ़ संकल्पित था । वैदिक धर्म के यज्ञ आदि के कृत्य जटिल हो गये थे। यज्ञादि कर्मकाण्ड आदि में बनावट (आडम्बर) अधिक एवं आत्मकल्याण की भावना कम हो गई थी। आर्य स्वयं भी इसके विरुद्ध थे और उनके दिमाग में इसमें सुधार हेतु भावना दिन प्रतिदिन बलवती होती जा रही थी । ब्राह्मण ग्रंथ, आरण्यक तथा उपनिषदों में कर्मकाण्ड के स्थान पर आत्मा परमात्मा का सम्बंध जन्म और मरण की समस्या तथा ब्रह्म विद्या पर विशेष जोर दिया जा रहा था। गीता में भगवान कृष्ण ने स्वयं भी यज्ञ आदि कृत्यों के स्थान पर ज्ञान, भक्ति और कर्म पर बल दिया । छठी शताब्दी पूर्व में मानव मस्तिष्क में काफी उथल पुथल आरम्भ हो चुकी थी। और इस काल का जन मानस वैदिक परम्पराओं की खुले रूप में खिलाफत करने लगा। इस काल में सामान्य व्यक्ति अच्छी प्रकार समझ गया कि आत्म कल्याण यज्ञादि से नहीं ज्ञान, भक्ति और कर्म के आधार पर ही हो सकता है। इस काल में विभिन्न क्षेत्रों में नई नई व्यवस्थाओं का प्रतिपादन हुआ किन्तु धार्मिक क्षेत्र में प्रभावी रूप से जन मानस की चेतना में परिवर्तन का श्रेय केवल गौतम बुद्ध और वर्द्धमान महावीर को प्राप्त है। 600 ई. पू. की धार्मिक क्रान्ति से निम्न लिखित कारण थे।
(1) वैदिक धर्म में दोष - वैदिक धार्मिक नियम जिनमें कि आर्य पूर्ण आस्था रखते थे वह कालान्तर में दोषमुक्त न रख सके उनमें व्यापक तौर पर बाह्य आडम्बर समा गया । इस काल में बुद्धिजीवी व्यक्तियों ने ब्राह्मणों के इस प्रचार पर कि वेद ईश्वरीय है और वेदों को पढ़ना ही आत्मकल्याण का साधन है । पर विश्वास नहीं किया और ब्राह्मणों की इस विचार धारा का उपनिषद काल में विरोध होने लगा। छांदोग्य उपनिषद में नारद ने इस पर शंका करते हुए कहा था कि “मैंने सभी वेद शास्त्र पदे तथा वेद मंत्रों का ज्ञाता हूँ किन्तु ये आत्मसात नहीं हैं। मैं नहीं जानता कि मैं कौन हूँ।” | इस काल में वेदों का तो विरोध हुआ ही साथ ही वैदिक कर्मकाण्डों का भी प्रबल विरोध हुआ यज्ञ आदि में बलि स्वरूप पशुओं की जान ली जाती थी और यज्ञादि अथवा वैदिक कर्मकाण्डों की क्रिया इतनी पेचीदी बन गई थी कि यह तब तक पूर्ण नहीं होते थे जब तक कि पुरोहित न हो अर्थात् पुरोहितों की अनुपस्थिति में इनका सम्पादन नहीं होता था । यज्ञ अधिक खर्चीले हो गये और सामान्य नगरिक इनके खर्च को वहन करने में अपने आप को असमर्थ पाने लगा। इस तरह वैदिक कर्मकाण्ड का विरोध हर तरफ होने लगा । बुद्ध ने एक ब्राह्मण को सम्बोधित करते हुए कहा था “ब्राह्मण तुम लकड़ी जलाते हो किन्तु मैं अन्तर की ज्योति जगाता हूँ ।” आर्यों की पूर्व अवस्था में प्राकृतिक शक्तियों को देवता के रूप पूजन की श्रृद्धा थी परन्तु अनार्यों के सम्पर्क से हिन्दुओं में अनेक देवी देवताओं को पूरा जाने लगा। उत्तर वैदिक काल तक एक ईश्वर की भावना लुप्त हो गयी एवं देवताओं की संख्या काफी बढ़ गई । अनेक मनीषियों ने इसका काफी विरोध किया और लोगों को अनेक प्रकार के उपदेशों द्वारा ब्रह्म की शक्ति में आस्था हेतु प्रेरित किया।
(ii) ब्राह्मणों की अवनत दशा - आरम्भ में ब्राह्मण वेदों के जानने वाले एवं विद्या के धनी थे। उनमें धन के प्रति मोह नहीं था । उनको सच्चे अर्थों में विद्या का अध्ययन करना ही मुख्य ध्येय होता था। परन्तु कालान्तर में इनका मोह धन कमाने की ओर बढ़ा तथा वेदों के अभ्यास करने से विमुख होने लगे। इस प्रकार इनकी स्थिति दिन प्रतिदिन अवनति की दशा में जाने लगी इनकी पूर्व की दशा चतुर्वेदी अर्थात् चारों वेदों के ज्ञाता के रूप में प्रतिष्ठित थी परन्तु बाद में त्रिवेदी, द्विवेदी एवं इसके पश्चात् एक ब्राह्मण के लिए इतना जानना ही पर्याप्त माना गया कि वह मंत्रों का अर्थ समझे बिना ही यज्ञादि कर्मकाण्ड के मंत्र कंठस्थ कर ले, इस तरह इसका तीव्र विरोध हुआ । बौद्ध और जैनों ने ब्राह्मणों की खुले रूप में निन्दा की।
(ii) सामाजिक दुरावस्था - 600 ई. पू. में समाज में ऊँच नीच की भावना घर कर चुकी थी । व्यक्ति को जन्म के आधार पर ऊँच नीच की श्रेणी में रखा जाने लगा। समाज में जातिवाद का विष बढ़ रहा था। कोई भी निम्न आचरण का व्यक्ति यदि ब्राह्मण के घर में जन्मा है तो वह जाति के आधार पर ऊंचा ही समझा जाता था। जब कि दूसरी ओर विद्वत्ता प्राप्त व्यक्ति यदि शूद्र के घर जन्मा है तो वह नीच की श्रेणी में ही माना जाता था। इस प्रकार समाज अपनी दुर अवस्था में था । इस काल में समाज में किसी परिवर्तन की गुंजाइश नहीं रह गई थी। रूढ़िवादिता बढ़ रही थी । समाज में अनेक बुराइयाँ पनपने लगी इस स्थिति में जनमानस में व्यापक आक्रोश उत्पन्न होने लगा । समाज में स्त्रियों व शूद्रों की दशा दयनीय थी। इस काल में इनकी दशा का वर्णन करते हुए प्रो. जी.पी. सिंहल लिखते हैं कि स्त्रियों की दशा दिन प्रतिदिन हीन होती जा रही थी, उन्हें धर्म कर्मों से वंचित कर दिया गया था। उनकी स्वतंत्रता छिन गई थी। अब वह केवल घर की चार दीवारी में बन्द रहती थी। बुद्ध तथा महावीर ने इस दशा का तीव्र विरोध किया और उन्हें अपने संघों में महत्त्वपूर्ण स्थान दिया। स्त्रियों की भाँति शूद्रों की दशा भी अति दयनीय थी उनको भी धार्मिक अधिकारों से वंचित कर दिया गया मन्दिर अथवा पूजागृहों में उनका जाना निषिद्ध कर दिया । हिन्दू होते हुए भी वह वेद नहीं पढ़ सकते थे, अन्य सवर्ण छात्रों के साथ शिक्षा प्राप्त नहीं कर सकते थे, जनेऊ धारण नहीं कर सकते थे। इस दशा का चित्रण महाभारत के प्रकरण से किया जा सकता है। कि शूद्र होने के कारण एकलव्य को गुरु द्रोणाचार्य ने धनुर्विद्या सिखाने से मनाकर दिया शूद्र भी समाज में अपनी दयनीय स्थिति से व्याकुल थे एवं इस स्थिति के खिलाफ विद्रोह करने पर उतारू थे।
(iv) ब्राह्मण- क्षत्रिय प्रतिद्वन्द्विता - धर्म की प्रक्रिया जटिल हो जाने से समाज में ब्राह्मणों की प्रस्थिति में विशेष उन्नति हुई, उनका महत्त्व अधिक बढ़ गया। वे सभी वर्गों के सिरमौर माने जाने लगे क्योंकि विद्यादान का कार्य केवल उनके ही हाथों में था। धार्मिक कर्मकाण्डों में वे निपुण होते थे, इस तरह समाज में ब्राह्मणों को उनके त्याग तथा विद्याव्यसन के कारण समाज में शीर्षस्थ स्थान दिया गया था तथा क्षत्रियों को दूसरा क्षत्रिय इसे सहन नहीं कर सके। वे राज्य के स्वामी थे ब्राह्मण उन पर आश्रित थे फिर वे उनसे नीचा स्थान क्यों सहन करते । ब्राह्मणों को समाज में शीर्षस्थ स्थान केवल उनके ज्ञान के कारण ही था। अतः । क्षत्रियों ने भी ज्ञान अर्जित कर धार्मिक क्षेत्र में प्रवेश किया। क्षत्रियों ने उच्च कोटि की। 

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