ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तरी भारत के आर्थिक जीवन

। उत्तर -  बौद्ध तथा जैन ग्रंथों में पुत्री को पुत्र के समान समझने पर जोर दिया गया। महात्मा बुद्ध तो पुत्री को पुत्र से अच्छा मानते थे। जैनों में पुत्री को पुत्र के समान ही सम्पत्ति की हकदार माना है । ईसा पूर्व छठी शताब्दी में विवाह वयस्क होने पर होते थे। बाल विवाह प्रथा प्रचलित नहीं थी । सामान्य तया विवाह सजातीय होते थे, इन विवाहों में कुल की मर्यादा का विशेषत: ध्यान रखा जाता था । पुरुष को अधिक अथवा बहु विवाह करने की स्वतंत्रता थी। जबकि स्त्री के लिए एक विवाह की मर्यादा थी । इस काल में बालिकाओं को शिक्षा दी जाती थी एवं वह धर्म के प्रचार में मदद करती थी । इस काल में कोशाम्बी सम्राट की पुत्री जयन्ती, चम्पा सम्राट की पुत्री चन्दना आदि कई विदुषी महिलाओं के दृष्टा प्राप्त हैं। 600 ई. पू. स्त्रियों में पर्दा की प्रथा का चलन नहीं था स्त्रियाँ स्वतंत्रतापूर्वक उत्सवों में हिस्सा लेती एवं धर्म के प्रचार में सहभागी बनती थी लेकिन नारियों को पुरुषों के साथ मिलकर कार्य करना शंका की दृष्टि से देखा जाता था। बुद्ध साहित्य के एक प्रकरण के अनुसार बुद्ध स्त्रियों को संघर्ष में सम्मिलित करने के पक्ष में नहीं थे । परन्तु वे अपने शिष्य आनन्द की बात न टाल सके और उन्हें अपनी सहमति व्यक्त करनी पड़ी। समाज में गणिकाएं होती थी कुछ गणिकाएं समाज में सम्माननीय स्थान बनाये हुए थी । आम्रपाली गणिका का नाम इतिहास प्रसिद्ध है जिसने बौद्ध संघ को विपुल धन राशि दान के रूप में भेंट की।

रहन सहन - समाज में निम्न वर्ग की तुलना में उच्च वर्ग सम्पन्न अवस्था में था । भोजन में लोग अनाज, चावल, घी, दूध, फल का अधिकांशतः प्रयोग करते थे लेकिन इस शाकाहारी भोजन के साथ- साथ मांसाहारी भोजन भी प्रचलित था। बुद्ध एवं महावीर के अहिंसा प्रचार के फलस्वरूप निरामिश भोजन की तरफ जनसाधारण की प्रवृत्ति बढ़ रही थी। सभी प्रकार के वस्त्र निर्मित किये जाते थे। जिनमें सूती, रेशमी एवं ऊनी आदि थे । धन सम्पन्न व्यक्ति एवं राज्य परिवार के वस्त्रों पर सुनहरी कार्य भी किया जाता है। स्त्री एवं पुरुष दोनों ही रत्नों से युक्त आभूषण धारण करते थे और शरीर के सबसे निचले भाग पैर में जूते पहनने की भी प्रथा थी। कुल मिलाकर व्यक्ति अपना जीवन प्रसन्नता पूर्वक व्यतीत करते थे । मल्लयुद्ध, रथ दौड़, घुड़ दौड़ एवं जादूगर व नटों के तमाशे मनोरंजन के सामान्य साधन थे जिनमें लोग कड़ी मेहनत के पश्चात, मनोरंजन हेतु हिस्सा लेते थे। गणिकाओं को नगर वधु कहा जाता था जो कि अपनी संगीत एवं नृत्य कला से लोगों का मनोरंजन करती थी।

शिक्षा व्यवस्था - वैदिक काल में गुरुकुल शिक्षा पद्धति का विकास हुआ था। विद्या अर्जन गुरुकुलों में रहकर ही करना होता था। वही शिक्षा पद्धति कुछ परिवर्तन के साथ प्रचलित थी । बौद्धों के प्रसार से बौद्ध बिहार स्थापित होता थे जहाँ पर बौद्ध साहित्य के शिक्षण का प्रबंध होता था । आर्यों के उपनयन संस्कार की तरह ही बौद्ध विहारों में भी प्रवेश संस्कार होता था उसे प्रव्रज्या कहते थे । प्रव्रज्या की आयु 8 वर्ष थी। 12 वर्ष की उम्र में एक दूसरा संस्कार होता था उसे उपसंपदा कहते थे । सवर्ण व अवर्ण का कोई भेद नहीं था, विहारों में सभी जाति के व्यक्ति शिक्षा ग्रहण करते थे। कई निम्न जाति के लोग इन विहारों में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। शिक्षा प्रदान करने हेतु योग्य एवं अनुभवी व्यक्तियों का चयन किया जाता था । उपाध्याय, आचार्य आदि शिक्षा प्रदान करने वाले अध्यापकों की श्रेणियाँ थी। गुरुकुल प्रथा होने से गुरु शिष्यों का निकट सम्पर्क था । गुरु शिष्य से पुत्रवत् व्यवहार करते थे और गुरु के व्यक्तित्व का शिष्य पर प्रभाव पड़ना अवश्यम्भावी था । शिक्षा का माध्यम जनता की भाषा पाली थी । धार्मिक ग्रंथों के अलावा संस्कृत ज्योतिष, व्याकरण, तंत्र मंत्र एवं कलाओं की शिक्षा दी जाती थी इस प्रकार शिक्षा का पाठ्यक्रम विस्तृत था । छठी ई. पू. काल का प्रसिद्ध विद्यालय तक्षशिला था यह विद्यालय विद्या अर्जन के लिए इतना विख्यात था कि दूर-दूर से विद्या अर्जन हेतु छात्र यहाँ आते थे। विद्यालय में प्रवेश की आयु 16 वर्ष थी । यहाँ प्रवेश लेने वाले सम्पन्न छात्र शिक्षा के उपलक्ष में धन देते थे एवं गरीब विद्यार्थी अपने श्रम के रूप में शुल्क चुकाते थे । शिक्षा प्रदान करने की व्यवस्था दिन और रात दोनों में ही थी। धनी वर्ग के शिक्षार्थी जो धन देकर प्रवेश लेते थे उनकी शिक्षा दिन में एवं श्रम करके शिक्षा का शुल्क चुकाने वाले छात्रों को रात के समय शिक्षा दी जाती थी। दिन में ये छात्र विद्यालय के लिए कार्य करते थे। छात्र या तो विद्यालय परिसर में रह सकते थे अथवा अपने घरों पर। कक्षा में मानीटर की प्रणाली भी प्रचलित थी। सीनियर विद्यार्थी गुरुजनों की शिक्षा देने में मदद करते थे। इनको जैठन्ते-वासिक कहते थे।

छात्रों का सारा खर्चा विद्यालय उठाता था । शिक्षा पाठ्यक्रम में वेदों तथा शिल्पों की शिक्षा को मुख्य स्थान प्राप्त था। आयुर्वेद, ज्योतिष एवं शास्त्र संचालन की शिक्षा भी व्यवस्था थी । नीच जाति एवं स्त्रियों को प्रवेश नहीं दिया जाता था।

छठी शताब्दी ई. पू. में आर्थिक जीवन । नगरों का विकास - छठी शताब्दी ई. पू. में आर्थिक जीवन समुन्नत था। आर्यों की सभ्यता ग्रामीण सभ्यता थी। इस काल तक वृहद् नगरों का उद्भव हो गया था। प्रान्तों की राजधानियाँ जिस स्थान पर बनायी गयी थी वह स्थान प्रसिद्ध तो थे ही साथ ही वहाँ व्यापारिक नगरों का भी विकास हो गया था। राजगृह, कौशाम्बी वाराणसी, वैशाली प्रतिष्ठान, उज्जयिनी आदि ऐसे नगर थे जो व्यापार की दृष्टि से बहुत महत्त्वपूर्ण थे इन नगरों का वर्णन बौद्ध एवं जैन ग्रंथों में मिलता है। धनी एवं सम्पन्न लोगों के बड़े बड़े महल थे जो कई मंजिलों के थे इस काल में सात मंजिली इमारतों के साक्ष्य भी मिलते हैं। मकानों का निर्माण ईंटों व पट्टियों से होता था। इन मकानों में शौचालय भोजनकक्ष, शयनकक्ष, रसोई घर आदि सब होते थे। बहुत से नगर अपनी अपनी निर्मित वस्तुओं के लिए विख्यात थे इनमें गाँधार ऊनी वस्त्रों के लिए, शिवदेश सूती वस्त्रों एवं वाराणसी रेशमी वस्त्रों के लिए विख्यात थे। इन नगरों में व्यापारिक एवं दैनिक आवश्यकता की वस्तुओं के बड़े बड़े बाजार होते थे।

Post a Comment

0 Comments