Gupta Dynasty, (e) Harsha, (f) Bouddh Religion.

Gupta Dynasty, (e) Harsha, (f) Bouddh Religion.
विदेशी यात्रियों के विवरण में फाह्यान का विवरण गुप्तकालीन इतिहास । निर्माण में सर्वाधिक सहायक है। उसके विवरण से चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के काल की सामाजिक तथा धार्मिक दशा का ज्ञान होता है। उसके विवरण से भारत में विभिन्न । , कलाओं तथा व्यवसायों की प्रगति की भी जानकारी मिलती है। एक अन्य चीनी यात्री सुग-युन का वृत्तान्त हूणों के आक्रमण और उसके द्वारा बौद्ध धर्म पर किये जाने वाले । अत्याचारों की जानकारी मिलती है। गुप्तकालीन अनेक अभिलेख भी इस वंश के। इतिहास निर्माण में सहायक हैं। इनमें सर्वप्रथम एवं सर्वाधिक उल्लेखनीय समुद्रगुप्त की। प्रयाग प्रशस्ति ही है। इस प्रशस्ति में न केवल उसकी विजयों का वर्णन मिलता है। अपितु उसके साथ ही पूर्ववर्ती राजाओं के बारे में भी विवरण प्राप्त होता है। यह । अभिलेख उसकी विजयों एवं चारित्रिक गुरु की भी जानकारी देता है। समुद्रगुप्त का दूसरा अभिलेख ऐरण का अभिलेख है जो उसकी उपलब्धियों एवं कार्यों का विवरण देता है। गुप्तकाल के चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य के बारे में महरौली स्थित लौह स्तम्भ लोब और उदयगिरी गुहा अभिलेख महत्त्वपूर्ण ऐतिहासिक स्रोत माने जाते हैं। इसी शासक के अन्य अभिलेख गढ़वा, साँची तथा मथुरा में प्राप्त हुए हैं। इनसे उनकी विजयी, शासक-प्रबन्ध, धर्म तथा तत्कालीन भारतीय आर्थिक अवस्था के बारे में जानकारी। मिलती है। कुमारगुप्त प्रथम के बारे में वैग्राम, धनदेह करमदंडा, गढ़वा, दामोदरपुर, मन्दसौर आदि स्थानों पर जो अभिलेख मिले हैं, उनसे उसकी उपलब्धियों की जानकारी मिली है। गुप्तकालीन सिक्के भी इस वंश के इतिहास निर्माण में सहायक है। समुद्रगुप्त द्वारा प्रसारित सिक्कों पर बने अश्वमेध यज्ञ के चिह्न उसके धर्म तथा धार्मिक विचारों के बारे में जानकारी देते हैं। कुछ अन्य सिक्के जिन पर वीणा बनी हुई है, उसके संगीत प्रेम को प्रदर्शित करते हैं। इसी तरह चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य कालीन मुद्राओं पर बने धनुर्धर छत्र सिंह आदि उसके शिकार प्रेम को प्रदर्शित करते हैं। कुमार गुप्त, स्कन्दगुप्त तथा उत्तर कालीन गुप्त सम्राटों की अनेकानेक मुद्राएं उनके काल के भारतीय इतिहास की कड़ियों का निर्माण करते हैं। गुप्तकालीन मुहरों ने गुप्त युगीन इतिहास सम्बन्धी गुत्थियों को सुलझाने में विशेष सहायता दी है। प्राचीन वैशाली (बिहार) नामक स्थान से मिली ये मोहरें तत्कालीन प्रान्तीय और स्थानीय शासन-व्यवस्था की भी अच्छी जानकारी देती हैं। गुप्तकालीन अजन्ता की गुफाओं के चित्र उनके काल में चित्रकला की प्रगति को बताते हैं। इस काल की भर्तियाँ इस बात का प्रमाण हैं कि इस कला के क्षेत्र से विदेशी प्रभाव प्रायः लुप्त होने लगा था। स्थापत्य कला की प्रगति को देवगढ़ का दशावतार मन्दिर, ऐहोल का दुर्गा मन्दिर, गया का बौद्ध मन्दिर तथा उदयगिरी का विष्णु मन्दिर सर्वाधिक उल्लेखनीय है।
(ड) हर्ष के लिए प्रयुक्त मूल ऐतिहासिक स्रोत–हर्षकालीन इतिहास जिसका सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साधन ह्वेनसांग का विवरण माना जाता है। उसकी पुस्तक सि-य-की से हमें हर्ष, उसके दरबार, तत्कालीन प्रशासकीय व्यवस्था, सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक जीवन के बारे में विस्तृत जानकारी प्राप्त होती है। हर्ष के आश्रित कवि बाणभट्ट की रचनाएं भी हर्षकालीन इतिहास के बारे में जानकारी देती हैं। उसने ‘हर्ष चरित्र' नामक प्रसिद्ध ग्रन्थ लिखा । इस ग्रन्थ के कुल सात प्रकरण हैं। प्रथम प्रकरण में लेखक ने स्वयं तथा अपने परिवार के बारे में लिखा है। अन्य तीन प्रकरणों में हर्ष के पूर्वजों एवं थानेश्वर के राजवंश के इतिहास का वृत्तान्त है। अन्य दो प्रकरणों में राजा हर्ष की उपलब्धियों का विवरण है तथा अन्तिम प्रकरण में विंध्याचल के वनों में रहने वाले विभिन्न धार्मिक सम्प्रदायों का वर्णन प्राप्त होता है। बाणभट्ट की दूसरी रचना ‘कादम्बरी' है। यह एक काव्य ग्रन्थ है। इससे भी हर्षकालीन भारतीय राजनीतिक, सामाजिक एवं धार्मिक जीवन की जानकारी मिलती है। हर्ष के बारे में तीसरे ऐतिहासिक स्रोत उसकी अपनी रचनाएं हैं। उसने तीन नाटक-नागानन्द, प्रियदर्शिका तथा रत्नावली लिखे। ये रचनायें उसके दरबारी तथा महलों के जीवन के साथ-साथ तत्कालीन भारतीय सामाजिक और धार्मिक जीवन पर भी प्रकाश डालती हैं। इसके अतिरिक्त शंकर द्वारा ‘हर्ष चरित' पर लिखी टीका उसके (हर्ष) तथा बंगाल के शासक शशांक के पारस्परिक सम्बन्धों पर बहुत अच्छी रोशनी डालती है। हर्षकालीन प्राप्त एक ताँबे की मोहर तथा दो ताम्रलेख (बांसखेरा तथा मधुबन में प्राप्त हुए) भी उसके काल के इतिहास निर्माण में सहायक हैं।
(क) बौद्ध धर्म के अध्ययन के प्रयुक्त मूल साधन बौद्ध धर्म के बारे में कई प्रकार के ऐतिहासिक स्रोतों को उपयोग में लाया जा सकता है। सर्वप्रथम बौद्ध धर्म से सम्बन्धित साहित्य उल्लेखनीय है । बौद्धों के धार्मिक सिद्धान्त प्रमुखतया पाली में लिखित त्रिपिटिक-विनय पिटक, सुत्त पिटक और अभिधम्म पिटक–में संग्रहीत हैं। विनय पिटक में भिक्षु और भिक्षुणियों के संघ एवं दैनिक जीवन सम्बन्धी आचार-विचार नियम आदि दिये गये हैं। सुत्त पिटक धर्मोपदेशों का संग्रह है। वे हैं- दीर्घ-निकाय, मज्झिमनिकाय, संयुक्तनिकाय, अंगुत्तरनिकाय और खुद्दकनिकाय । इनमें सर्वाधिक विशाल एवं महत्त्वपूर्ण अन्तिम संग्रह है क्योंकि इसके अन्तर्गत दस ग्रन्थ आते हैं। जिनमें अन्य नौ ग्रन्थों (खुद्दकपाठ, धम्मपद, उदान, इतिवृन्तक, सुत्तनिपात, विमानवत्थु, पेतवत्यु, थेरगाथा तथा थेरीगाथा) के अतिरिक्त दसवाँ जातक शामिल है। जातक भगवान बुद्ध के पर्व जन्म की कहानियाँ हैं। यद्यपि मौलिक जातक-संग्रह विलुप्त हो गया है, परन्तु इस ग्रन्थ पर लिखी एक टीका जातक इवण्णना प्राप्त है जो किसी सिंहली मिश्रु ने लिखी थी। जातक में दोनों प्रकार की शैली (अर्थात् पद्यात्मक तथा गद्यात्मक) का प्रयोग किया गया है। इसमें दिये विवरण से धार्मिक, आर्थिक एवं सामाजिक अवस्था के बारे में जानकारी मिलती है। तीसरी पिटक अर्थात् अभिधम्मपिटक में बौद्ध धर्म का विवेचन उच्चतर व्याख्या तथा दर्शन के रूप में किया गया है। इनके अतिरिक्त पाली भाषा में ही रचित मिलिन्दपन्हों, दीपवंश तथा महावंश भी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ हैं। मिलिन्दपन्हों में यूनानी नरेश मिलेन्द (मीनेण्डर) और बौद्ध भिक्षु नाम का वार्तालाप है। दीपवंश में सिंहलद्वीप के इतिहास का वर्णन है लेकिन इस ग्रन्थ का कपोलकल्पित कथाओं के कारण ऐतिहासिक महत्त्व नहीं माना जाता। महावंश भी सिंहलद्वीप का ही ग्रन्थ है। यह ग्रन्थ चन्द्रगुप्त मौर्य के बारे में विशेष जानकारी देने के साथ-साथ बौद्ध धर्म के बारे में अतिशयोक्तिपूर्ण कथाएं बताता है। पाली के अतिरिक्त कुछ ग्रन्थ संस्कृत भाषाओं में भी बौद्ध धर्म से सम्बन्धित हैं। संस्कृत भाषा के बौद्ध ग्रन्थों में कुछ हीनयान सम्प्रदाय से तथा अधिकतर महायान सम्प्रदाय से सम्बंधित हैं। इनमें उल्लेखनीय हैं महावस्तु, ललित विस्तार, अश्वघोष द्वारा रचित बुद्ध चरित्र तथा सौन्दरानन्द-काव्य सर्वाधिक प्रसिद्ध | उपर्युक्त धार्मिक साहित्य के अतिरिक्त विदेशी यात्रियों के विवरण विशेषकर चीनी यात्री ह्वेनसांग की पुस्तक सि-यु-की भी उलेखनीय है। तिब्बती यात्री लाम तारानाथ के विवरणों से भी बौद्ध धर्म के बारे में जानकारी मिलती है। इसके अतिरिक्त अशोक के शिलालेख, सारनाथ का घण्टाकार स्तम्भ, अजन्ता की मूर्तियाँ, विभिन्न चैत्य तथा मठ, नालन्दा में बुद्ध की ताँबे की मूर्तियाँ आदि से भी बौद्ध धर्म की जानकारी मिलती है।

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