Trace the Social, Economic, Religious and political life in North India in the 6th century B.C.

प्रश्न 9. ईसा पूर्व छठी शताब्दी में उत्तरी भारत के सामाजिक, आर्थिक, एवं सामाजिक धार्मिक जीवन को चित्रित कीजिए।
Trace the Social, Economic, Religious and political life in North India in the 6th century B.C.
| अथवा छठी शताब्दी ई. पू. में धार्मिक आन्दोलन के क्या कारण थे?
What were the causes of the Religious movements in 6th century B.C.?
। उत्तर -  बौद्ध धर्म के शीघ्र लुप्त हो जाने के कारण । बौद्ध धर्म का प्रसार विद्युत गति से हुआ। भारत में ही नहीं श्याम, कम्बोडिया, ब्रह्मदेश, चीन, जापान तथा तिब्बत जैसे सुदूर विदेशों में भी इसका एक प्रचण्ड आँधी की भाँति प्रवेश हुआ। इसके अनुयायियों की संख्या असंख्य हो गई किंतु 12वीं शताब्दी के समाप्त होते होते इसका प्रभाव क्षीण प्रायः हो गया और इसके अनुयायियों की संख्या सीमित रह गई है। विदेशों में तो यह फिर भी काफी लम्बे समय तक बना रहा, परन्तु भारत में जो इसकी जन्म इथली थी इसका लोप बड़ी नाटकीय गति से हुआ । बौद्ध धर्म की अवनति और इसके लुप्त हे जाने के अग्रलिखित कारण थे
(1) बौद्ध धर्म में विकृतियाँ - प्रारम्भ में बौद्ध धर्म अपनी सरलता तथा बौधिगम्यता के कारण लाखों नर नारियों को कण्ठहार बन गया। इसकी सरलता और व्यावहारिकता ने लाखों करोड़ों लोगों को आकृष्ट किया और वे बड़ी संख्या में इसके अनुयायी बन गये किन्तु कुछ अंतराल के पश्चात् इसमें भी वैदिक धर्म की तरह कर्म कांड ने प्रवेश कर लिया । बौद्ध धर्म की दो शाखाएँ हो गई थी हीनयान और महायान । हीनयान में यन्त्रों तन्त्रों की प्रधानता थी और उसके अनुसरण करने का मार्ग जटिल था। हिंदू धर्म की जिन बुराइयों से छुटकारा पाने के लिए लोगों ने बौद्ध धर्म में प्रवेश लिया था उन्हीं बुराइयों के इसमें उत्पन्न होने पर उनका इसके प्रति आकर्षण कम होता चला गया।
(2) भिक्षुओं को चारित्रिक पतन - बौद्ध धर्म के मठ शिक्षा, प्रसार और अध्ययन के केन्द्र थे । बौद्ध भिक्षु अपने सदाचारी जीवन के लिए विख्यात थे। वे अपने सत्कर्मों से लोगों को स्वच्छ जीवन की प्रेरणा देते थे, किंतु कुछ समय बाद भिक्षु भिक्षुणियों के नैतिक और चारित्रिक जीवन का पतन हो गया । भिक्षु दुराचारी और भिक्षुणियाँ व्यभिचारिणी बन गई। दोनों का जीवन लक्ष्य भोग विलास बन गया हीनयान और वज्रयान में सुरा और सुन्दरी के सेवन पर रोक हटाली । बौद्ध मठ भ्रष्टाचार के केन्द्र बन गये । शीघ्र ही बौद्ध धर्म से लोगों का विश्वास हटने लग गया।
(3) हीनयान और महायानियों का कलह - जैन धर्म में भी दो सम्प्रदाय बन गये थे। श्वेताम्बर और दिगम्बर किन्तु यह विभाजन होने पर भी दोनों ने मिलकर सोत्साह जैन धर्म का प्रसार किया । बौद्ध धर्म जब हीनयान और महायान शाखाओं में विभक्त हो गया तो संघ में दरार आ गई। दोनों सम्प्रदाय के अनुयायियों में काफी कलह और लड़ाई-झगड़ा चलता । था । एक दूसरे को नीचा दिखाने के लिए कटिबद्ध हो गया । इस आंतरिक कलह की स्थिति ने बौद्ध धर्म की काफी हानि की।
(4) हिंदू धर्म का पुनर्जागरण - बौद्ध धर्म की असाधारण प्रगति से हिंदू धर्म के अनेक प्रखर आचार्य और विद्वान चौकन्ने हो गये थे। उन्होंने सोचा यदि बौद्ध धर्म का इसी भाँति अबाध गति से प्रसार होता रहा तो हिंदू धर्म का लोप हो जायेगा। उन्होंने हिंदू धर्म की पुनः प्रतिष्ठा का बीड़ा उठाया। शंकराचार्य और कुमारिल भट्ट जैसे जगतगुरुओं ने धर्म में व्याप्त कुरीतियों को दूर करने का भरसक प्रयत्न किया। उन्होंने सभायें आयोजित कर बौद्ध धर्म का खण्डन किया और वैदिक धर्म की उत्कृष्टता की ओर लोगों का ध्यान आकर्षित किया। हिंदू धर्म के पुनरुत्थान के इस आंदोलन से बौद्ध धर्म की क्षति हुई।
| (5) राजाओं का विरोध - हर्ष के बाद उत्तर भारत में राजपूतों का अभ्युदय हुआ। दक्षिणी भारत में कई प्रबल राजतन्त्र स्थापित हुए। राजपूत युद्ध प्रिय थे । वे हिंसक शक्ति के उपासक थे। शौर्य प्रदर्शन उनकी स्वाभाविक प्रवृत्ति थी और युद्ध कौशल उनका जातीय गौरव। उन्हें बौद्ध-धर्म का अहिंसक सिद्धान्त पसन्द नहीं आया। अत: अपने- अपने राज्यों में हिन्दू धर्म को ही अधिक महत्त्व दिया। उन्होंने अपने दरबार में अनेक हिन्दू विद्वानों को संरक्षण दिया । हिन्दुओं के मन्दिर निर्माण के लिए भी उन्होंने विपुल धन खर्च किया। हिन्दू-धर्म की परम्पराओं और रीति रिवाजों को फिर से प्रारम्भ किया। राजपूत राजाओं के इस विरोधी अभ्युदय रुख ने बौद्ध धर्म की प्रगति को बहुत अंश तक अवरुद्ध कर दिया।
(6) विदेशियों के आक्रमण - पतन की ओर अग्रसर बौद्ध धर्म को सबसे अधिक क्षति विदेशियों के आक्रमणों ने पहुँचाई । सर्वप्रथम भारत पर हूणों के आक्रमण हुए। हूणों ने बौद्ध बिहारों, स्तूपों और मठों का निर्ममता से ध्वंस कर डाला और हजारों बौद्धों को मौत के घाट उतार दिया । हूण-आक्रमण के पश्चात् तुर्कों के आक्रमण हुए। तुर्को ने बंगाल और बिहार तक अपने आक्रमणों का ताँता लगा दिया। बिहार और बंगाल बौद्ध बिहारों के केन्द्र थे। बिहारों के पास ही नालंदा और विक्रमशिला जैसे विश्वविद्यालय थे जहाँ देश विदेशों से हजारों की तादाद में अध्ययन करने के लिए विद्यार्थी इकट्टे होते थे। विदेशियों ने इन विश्वविद्यालयों और इनमें स्थित दुर्लभ पुस्तकालयों को जलाकर भस्म कर दिया। इस प्रकार इनके नष्ट होने से बौद्धों की अपार क्षति हुई । ह्वेनसाँग और इत्सिंग दोनों ही पर्यटकों ने बौद्ध धर्म की इस शोचनीय स्थिति का अपने यात्रा विवरणों में उल्लेख किया है।
(7) राजकीय संरक्षण में कमी - प्रारम्भ में कई क्षत्रिय और गैर क्षत्रिय राजाओं ने बौद्ध धर्म को राजकीय एवं आर्थिक संरक्षण दिया । बौद्ध धर्म का प्रसार करने में भी उन्होंने भरसक प्रयत्न किये। किंतु बाद में गुप्तकालीन शासकों और शुंग वंश के राजाओं ने हिन्दू धर्म को संरक्षण देना आरम्भ कर दिया । हिन्दू धर्म के अनुयायी इन शासकों ने बौद्ध बिहारों को आर्थिक सहायता देना बन्द कर दिया और उनका झुकाव हिन्दू धर्म की ओर हो गया। बौद्ध धर्म को इससे बड़ी हानि हुई ।।
इस प्रकार हम देखते हैं कि कुछ आन्तरिक कारणों से और कुछ बाह्य स्थितियों से बौद्ध धर्म का लोप हो गया ।

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