Write an essay on the Trade relation from mid Asia of india in Mauryan Period. ।

प्रश्न 16. मौर्यकालीन व्यापार व्यवस्था का उल्लेख करो? Discuss the Trade system of Mauryan Period.
अथवा मौर्यकाल में भारत के मध्य एशिया से व्यापारिक संबंधों पर एक लेख लिखो।
Write an essay on the Trade relation from mid Asia of india in Mauryan Period. ।
उत्तर-मौर्यकाल में व्यापार व्यवस्था (Trade system in Mauryan Period) इस समय शासन व्यवस्थित था तथा साम्राज्य में पूर्ण शान्ति थी। विदेशों के साथ मैत्री सम्बन्ध था तथा पहले से स्थापित व्यापारिक विकास भी हो चुका था। क्रय-विक्रय के लिए राजकीय मुद्रा का चलन था। इन सभी कारणों ने तत्कालीन व्यापारिक गतिविधि को प्रश्रय दिया। साथ ही व्यापार पर राज्य का अंकुश बढा।
राज्य की ओर से व्यापार को व्यवस्था एवं प्रोत्साहन दिया जाता था। कुछ वस्तुओं के व्यापार पर राज्य का एकाधिकार था। इसलिए व्यापार को प्रोत्साहन देता तथा उसको नियन्त्रित रखना राजा का धर्म था। एक दृष्टिकोण यह भी लगता है कि कौटिल्य चूंकि व्यापारियों को चोर समझता है इसलिए उन्हें स्वच्छन्द छोड़ने के पक्ष में नहीं है। इसलिए ‘पण्याध्यक्ष' नामक अधिकारी की नियुक्ति राज्य की ओर से की जाती थी कि व्यापार की देख-भाल करे । इस समय व्यापार द्विमुखी था। कुछ सामग्रियों का व्यापार व्यक्तिगत क्षेत्र पर छोड़ा गया था तथा कुछ राज्य के नियंत्रण में उत्पन्न की जाती थीं जिनकी बिक्री की जिम्मेदारी राज्य की ही होती थी। दूसरी कोटि के व्यापार पर राज्य का एकाधिकार होता था।
व्यापार के कुछ निश्चित नियम थे कि इससे राज्य की आय में अधिक से अधिक वृद्धि हो तथा जनता को कम-से-कम कीमत पर वस्तुएँ प्राप्त हों। प्रमुख नियम थे-(1) व्यापार प्रारम्भ करने के लिए राज्य से आदेश लेना पड़ता था। इसे व्यापारिक पंजीकरण ही कह सकते हैं। (2) वस्तुओं की बिक्री उत्पादन केन्द्रों में नहीं अपितु बाजारों में ही हो सकती थी। (3) व्यापारी बाजार में वस्तु लाने के पहले चुंगी घरों में वस्तु के सम्बन्ध की विस्तृत जानकारी यथा मात्रा, प्रकार आदि देकर ही ला सकता था। (4) चूँगी देने के बाद ही दुकानों पर वस्तुएँ पहुँचती थी। (5) अधिकारी वस्तु की शुद्धता की जांच करने के बाद ही उस पर बिक्री के लिए मुहर लगाता था। बिना मुहर लगी वस्तुओं की बिक्री नहीं की जा सकती थी। (6) तौल-माप, कीमत, शुद्धता आदि को सही बनाए रखनी पड़ती थी। इसमें अन्तर आने पर विक्रेता दण्डित होता था। (7) वस्तुओं के मूल्य निश्चित थे। उन्हें घटाने-बढ़ाने का अधिकार व्यापारियों को नहीं था। (8) भावों के उतार-चढ़ाव पर नियंत्रण रखा जाता था। (१) जब कभी किसी वस्तु की माँग बढ़ जाती थी तो मन चाही मात्रा में उसका स्टाक व्यापारी नहीं रख सकते थे। राज्य की ओर से इस पर प्रतिबन्ध लगा दिया जाता था। इन सिद्धान्तों के परिपालन में राज्य-कर्मचारी, गुप्तचर तथा पाटलिपुत्र का नगर निगम जागरूक रहता था। (1) आन्तरिक व्यापार
आन्तरिक व्यापार के लिए देश में सड़कों का जाल बिछा था। इस समय छ: प्रमुख आन्तरिक मार्ग पाटलिपुत्र में थे। तीन उत्तर से दक्षिण जाते थे और तीन पूरब से पश्चिम ।। यद्यपि डॉ. वी. पी. सिन्हा ने कहा है कि मौर्यकालीन मार्गों का उल्लेख कहीं नहीं है। बौद्धकालीन मार्ग ही इस समय रहे होंगे। एक सड़क पाटलिपुत्र से पश्चिमोत्तर को जाती। थी। यह लगभग 1500 कोस लम्बी थी। दूसरी सड़क हिमालय की ओर जाती थी। इसे हैमवतपथ कहा गया है। तीसरी सड़क पाटलिपुत्र से पूरब की ओर जाती थी। दक्षिणापथ में भी मार्गों की यही स्थिति थी। इन से अनेक छोटे-छोटे उपमार्ग निकलते थे। गाँवों में राज्य द्वारा व्यापारिक उद्देश्य से निर्मित चौड़ी सड़कें थी । चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक के विस्तृत साम्राज्य में परस्पर केन्द्रों के बीच व्यापारिक सम्पर्क रहा होगा। मेगस्थनीज के अनुसर पुष्कलावती और पाटलिपुत्र के बीच ग्रैण्डट्रंक रोड़ बना था जिसमें 10 स्टेडिया पर पत्थर गड़े थे। अशोक के समय यातायात की सुविधा के लिए सड़कों पर आधे-आधे कोस पर वृक्ष लगवाए गये, कुएँ खुदवाये गये, सरायें बनवाई गई और पौशाला की व्यवस्था की गई। स्ट्रैवो के अनुसार भी प्रत्येक दस स्टेडिया पर दूरी सूचक प्रस्तर स्तम्भ गाड़े गए थे। अशोक स्तम्भ सम्भवतः उसके व्यापारिक मार्गों पर लगाए गए थे। धर्म प्रचार के उद्देश्य के साथ सही कार्य के निर्देशक के रूप में उचित स्थानों पर खड़े किए गए। होंगे। दूर के लिए नावों का प्रयोग किया जाता और समीप के लिए सड़कों का । पश्चिमी विजय के कारण चन्द्रगुप्त का अधिकार उत्तरी-पश्चिमी और पश्चिमी स्थल मार्गों पर हो गया था। इनके साथ नदियों से भी व्यापार किया जाता था। नदियों के आकार के अनुसार उनमें छोटी-बड़ी नावें उतारी जाती थी जिनसे माल विभिन्न स्थानों पर पहुँचाया जाता था। कौटिल्य के अनुसार व्यापार और यात्रा हेतु मार्ग में नावों की व्यवस्था राज्य करता था । मार्गों में सुरक्षा निमित्त राज्य एक प्रकार का कर वसूलता था। यदि व्यापारी को कोई नुकसान मार्गों में होता था तो उसकी पूर्ति राज्य करता था।
व्यापारिक नगर देश में विशेष प्रसिद्ध थे। वहाँ विशिष्ट प्रकार की वस्तुएँ तैयार की जाती थी जैसे-कश्मीर और कौशल में हीरा, हिमालय प्रदेश में चमड़ा, काशी में वस्त्र, नेपाल में ऊन, केरल में मणियाँ आदि। डॉ. मोतीचन्द के अनुसार बंगाल, पौंडू, काशी, सुवर्णकुण्ड, मथुरा, अपरांत, कलिंग, बंगाल, कौशाम्बी, महिष्मती वस्त्र उद्योग का, मालावार जवाहरात का, दक्षिण भारत चन्दन की लकड़ी का तथा थाना, सिंध और बल्ख घोड़े का प्रमुख केन्द्र था। इन स्थानों से ये सामग्रियाँ खरीद कर विदेशों में विक्रय के लिए भेजी जाती थी। इसी से कौटिल्य ने लिखा है कि नगर बसाते समय ध्यान रखना चाहिए कि नगर में वारिपथ और स्थलपथ दोनों ही हों। | एरियन के विवरण से बजिरा नगर का ज्ञान प्राप्त होता है। स्वात तथा सिन्धु के बीच में स्थित यह व्यापारिक केन्द्र था। इसका व्यापारिक सम्बन्ध स्वातधारी, सिन्धु तथा काबुल नदियों पर स्थित नगरों से था। इसी से सम्भवत: व्यापारिक केन्द्रों का नाम बाजार या मण्डी रखा गया होगा। तक्षशिला स्वर्ण उत्पादक एक प्रसिद्ध नगर था। अशोक के राज्याभिषेक के समय उसके राजकोष में 36 करोड़ स्वर्ण मुद्रायें थी। इस प्रकार अनेक नगर व्यापारिक दृष्टि से प्रसिद्ध थे।
व्यापार की सुविधा के लिए नाप तौल आदि की नियन्त्रित व्यवस्था थी। अनेक मान्यता प्राप्त बाट क्रमिक गुणकों में विभाजित थे। इनकी चर्चा आगे माप तौल के अध्याय में की जायेगी। क्रय-विक्रय के लिए सिक्कों का चलन था। अदल-बदल की प्रणालीनियम प्रयोग की जाती थी। व्यापारी भी अपनी सुविधा के लिए संगठन बनाते थे जिनके अपने प्रतिबन्ध होते थे। इनका उल्लंघन करना दण्डनीय था। इससे स्पष्ट है कि आन्तरिक व्यापार को व्यवस्थित करने के लिए राज्य तथा जन स्तर से अनेक व्यवस्थाएं की गई थीं। । आन्तरिक व्यापारिक समृद्धि के लिए राज्य की ओर से एक विभाग था जिसका प्रधान 'पण्याध्यक्ष' होता था। उसके अधीन कई विभाग थे। प्रत्येक विभाग की देख-रेख के लिए अलग-अलग संस्थाध्यक्षों की नियुक्ति की गई थी। इनका प्रमुख कार्य था यह देखना कि क्रय-विक्रय में कोई गड़बड़ी न हो जैसे-पुराने माल को नया कह कर बेचना, वस्तुओं में मिलावट करके अशुद्ध बनाना, बिक्री किये गए माल को बदल देना, गलत सैम्पल दिखाकर माल बेचना आदि । तौल आदि की गड़बड़ियों के लिए भी यह जिम्मेदार थे। ऐसी गड़बड़ी पर दोषी को दण्ड देते थे। अवैध रूप से वस्तु संग्रहीत करने, कीमत बढ़ा कर बेचने, अधिक मुनाफाखोरी करने वालों को दण्ड देना भी इन्हीं का कार्य था। यदि कभी किसी वस्तु की कीमत राज्य की ओर से अधिक निर्धारित हो और बीच में वस्तुओं की पूर्ति बढ़ने से यदि उसकी बिक्री सम्भव नहीं हो सकती हो तो पण्याध्यक्ष वैसी सभी वस्तुओं को एकत्रित करा कर अपनी ओर से उसकी बिक्री की व्यवस्था करता था। ऐसा विवरण हमें कौटिल्य तथा मेगस्थनीज दोनों से मिलता है। | श्रेणियाँ तथा निगमों का भी ज्ञान अर्थशास्त्र से प्राप्त होता है। व्यापारियों के ये संगठन अपना व्यापारिक नियम बनाते थे। इसका पालन दृढ़तापूर्वक व्यापारियों को करना पड़ता था। राज्य की ओर से इन्हें मान्यता प्राप्त होती थी। नियमों का उल्लंघन करने पर उल्लंघनकर्ता को कठोर दण्ड दिया जाता था। (2) विदेशी व्यापार। इस समय भारत का विदेशी व्यापार अत्यन्त समुन्नत था। यह स्थल तथा जल दोनों ही मार्गों से होता था। स्थल मार्गों का उपयोग काफिलों के द्वारा होता था। जल मार्ग दूरस्थ स्थानों के व्यापार के लिए प्रयोग किया जाता था।
नावों तथा जलयानों के द्वारा वहाँ व्यापार होता था। पश्चिमी भारत में झेलम, चिनाव आदि नदियों के किनारे नौकाएँ तथा जलयानों का निर्माण किया जाता था। पंजाब इसके लिए प्रमुख स्थान था। चन्द्रगुप्त की सैन्य व्यवस्था में नौ सेना का एक अलग अंग ही था। उसकी देख-रेख के निमित्त नावाध्यक्ष नामक एक अलग अधिकारी होता था। अनेक बंदरगाह देश में थे। उनका अधिकारी बंदरगाहाध्यक्ष कहलाता था। उसी के नियंत्रण में जहाज बन्दरगाह में आते-जाते रहते थे। कौटिल्य ने आदेश दिया है कि यदि तूफान से टूटा जहाज कभी बन्दरगाह में प्रवेश कर जाय तो उसके अधिकारी का कर्तव्य है कि उस पर पिता की तरह दृष्टि रखे। पश्चिम में विदेशी बन्दरगाह थे-भरौच और सोपारा तथा पूरब में बन्दरगाह थे तामलुक और कलिंग। 

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