Write which do you know about Applied fundamental sources for study underwriting subjects

्रश्न 5. निम्नलिखित विषयों के अध्ययन के लिए प्रयुक्त मूल साधनों के विषय में आप जो कुछ जानते हैं, लिखिए
(अ) वैदिक सभ्यता, (ब) मौर्य वंश, (स) कुषाण, (द) गुप्तवंश, (इ) हर्ष, (क) बौद्ध धर्म ।
Write which do you know about Applied fundamental sources for study underwriting subjects -
(a) Vedic Civilization, (b) Mouryan Dynasty, (c) Kushanha, (d) Gupta Dynasty, (e) Harsha, (f) Bouddh Religion.
उतर-(अ) वैदिक सभ्यता के लिए प्रयुक्त मूल साधन–प्रारम्भिक आयौं । उदय तथा राजनीतिक प्रसार का इतिहास हमको पुराणों की अनुश्रुतियों में मिलता । जिसका समर्थन वेदों के प्रासंगिक संकेतों से भी होता है। किन्तु आर्यों के समचे जीवन उनकी सभ्यता, संस्कृति तथा धर्म का चित्र खींचने के लिए उस समय के साहित्य 'वेद' का सहारा लेना पड़ता है, क्योंकि वेद ही उनके प्राचीनतम ग्रन्थ हैं तथा इन्हीं को भारतीय आर्यों के प्राचीनतम इतिहास के लिए बड़ा ही उपयोगी माना गया। है। वेद चार हैं ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद तथा अथर्ववेद । यद्यपि वेद धार्मिक साहित्य में गिना जाता है परन्तु इसकी ऐतिहासिक उपादेयता भी कम नहीं है। ऋग्वेद एवं अथर्ववेद का महत्त्व अधिक है। ऋग्वेद सर्वाधिक प्राचीन है। इसमें आर्यों के जीवन की सम्पूर्ण जानकारी मिलती है तथा सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक परिस्थितियों पर प्रकाश पड़ता है। उत्तर वैदिक काल (लगभग 1500 ई.पू. से 600 ई.पू) के आर्यों के जीवन का अध्ययन करने के लिए इतिहासकार यजुर्वेद, सामवेद तथा अथर्ववेद संहिताओं का उपयोग करते हैं। इन तीनों संहिताओं में यजुर्वेद तथा सामवेद के अधिकतर मेंत्र ऋग्वेद से ही लिए गए हैं, इसलिए अथर्ववेद का ही महत्त्व है। अथर्ववेद में हमें उस समय के समाज का चित्र मिलता है जब आर्यों ने अनार्यों के अनेक धार्मिक विश्वासों को अपना लिया था। वेदों की परम्परा में संहिता, ब्राह्मण, आरण्यक और उपनिषद हैं। संहिता और ब्राह्मण ग्रन्थों से भी तत्कालीन सामाजिक तथा धार्मिक अवस्था का ज्ञान प्राप्त होता है। आरण्यक तथा उपनिषद जो वेद के अन्तिम भाग हैं, विद्वान ऋषियों की आत्मा, परमात्मा एवं जगत सम्बन्धी दार्शनिक विचारधाराओं से ओत-प्रोत हैं। वे प्रारम्भिक हिन्दुओं के धार्मिक एवं सांस्कृतिक जीवन पर प्रकाश डालते हैं, सूत्र ग्रन्थों से उस समय के सामाजिक तथा पारिवारिक जीवन पर पर्याप्त प्रकाश पड़ता है। इन ग्रन्थों में ही पाणिनि की व्याकरण की पुस्तक 'अष्टाध्यायी है, जिससे भी मूल्यवान ऐतिहासिक तथ्य खोज निकाले गए हैं। स्मृति ग्रन्थों में तो आचार-विचार का पूर्ण विवेचन है। इन धार्मिक ग्रन्थों से तत्कालीन राजनीतिक घटनाओं का विशेष विवरण नहीं मिलता, परन्तु सामाजिक जीवन को समझने के वे अच्छे साधन हैं। रामायण तथा महाभारत में भी कुछ ऐतिहासिक तथा धार्मिक तथ्य मिले हैं। यह महाकाव्य सम्भवतः ऐतिहासिक तथ्यों पर आधारित है किन्तु इनके रचने का काल । निश्चित नहीं है।
(ब) मौर्य वंश के इतिहास जानने के स्रोत इस वंश का राज्य लगभग 321 ई.पू. से 185 ई.पू. तक चला। इस वंश का इतिहास जानने के लिए अनेक स्रोत पर्याप्त हैं। इनमें यूनानी वृत्तान्त सबसे अधिक महत्त्वपूर्ण है। इनमें स्ट्रेबो, एरिअन, जस्टिन, एपिअन, प्लटार्क तथा मैगस्थनीज के नाम उल्लेखनीय हैं। इनमें सैल्यूकस निकेटर का राजदूत एवं ‘इण्डिका' का लेखक मैगस्थनीज सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण है। कौटिल्य का अर्थशास्त्र नामक ग्रन्थ राजनीतिशास्त्र सम्बन्धी महत्त्वपूर्ण ग्रन्थ है। इसे मौर्य युग का | इतिहास जानने का दूसरा सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण साधन माना जाता है। इसमें कौटिल्य ने
चन्द्रगुप्त के काल की राजनीतिक, सामाजिक तथा आर्थिक व्यवस्था का वर्णन किया है। प्रसिद्ध इतिहासकार बिण्टरनिटज के अनुसार, "प्राचीन भारत के शासन प्रबन्थ व्यापार, यद्ध तथा शान्ति आदि विषयों पर प्रकाश डालने वाली यह एक अद्वितीय पुस्तक है।" विशाखदत्त को मुद्राराक्षस संस्कृत भाषा का तत्कालीन ऐतिहासिक नाटक है। ग्रन्थ में कुछ ऐतिहासिक महत्त्व की सामग्री भी मिलती है। इसी में इस घटना का वर्णन है कि किस तरह चाणक्य ने नन्दों का विनाश कर चन्द्रगुप्त को गद्दी पर बिठाया। अपनी ऐतिहासिक कथावस्तु के कारण यह नाटक मगध क्रान्ति तथा चन्द्रगुप्त मौर्य के विषय में उपयोगी जानकारी प्रदान करता है। सम्राट अशोक के समय का मौर्यकालीन इतिहास जानने के सर्वाधिक विश्वसनीय एवं महत्त्वपूर्ण स्रोत अशोक के अनेक अभिलेख अथवा शिलालेख हैं। इनसे हमें अशोक के धर्म और नैतिकता के सिद्धान्तों के विषय में पूर्ण जानकारी हो जाती है। इनसे हमें अशोक के साम्राज्य विस्तार, उस द्वारा किए गए जन-हितैषी कार्यों, उस समय के शिक्षा प्रसार, भाषा, प्रजा के साथ उसका व्यवहार, उसका निजी जीवन, राजस्व सिद्धान्त, विचारों आदि पर प्रकाश डालते हैं। बौद्ध ग्रन्थ । और अनुश्रुतियों में मौर्यवंश और उसके सर्वाधिक प्रसिद्ध एवं लोकप्रिय सम्राट अशोक के विषय में ऐतिहासिक सामग्री प्राप्त होती है। बौद्ध साहित्य में श्रीलंका के मुख्य । ऐतिहासिक ग्रन्थ 'दीपवंश' ‘महावंश टीका 'महाबोधिवंश' तथा उत्तरी भारतीय ग्रन्थ ‘मिलिन्द पन्नह' से भी चन्द्रगुप्त मौर्य के जीवन की घटनाओं पर प्रकाश पड़ता है। दिव्यावदान में अशोक तथा कुणाल के विषय में ऐतिहासिक बातों का वर्णन है। बौद्ध ग्रन्थों में अशोक द्वारा बौद्ध धर्म स्वीकार करने एवं उसके प्रचार के लिए उसने । क्या-क्या किया, का भी पर्याप्त उल्लेख है। जैन साहित्य की दो पुस्तकें भद्रबाहु का । कल्पसूत्र तथा हेमचन्द्र का परिशिष्ट पर्व मुख्यतः चन्द्रगुप्त मौर्यकालीन इतिहास पर । प्रकाश डालते हैं। किसी हद तक इस काल के इतिहास को जानने में पुराण भी । सहायक है। मौर्यकाल की इमारतों के अवशेष से भी इस काल की वास्तुकला और । अन्य कलाओं के बारे में जानकारी मिलती है।
(स) कुषाण वंश का इतिहास जानने के स्रोत कुषाण वंश का इतिहास जानने । के लिए सर्वाधिक उपयोगी दो अभिलेख हैं। प्रथम अभिलेख पेशावर जिले में 64 ई. के पंजतर में प्राप्त एक अभिलेख में एक महान कुषाण राजा का उल्लेख मिलता है। सम्भवतः वह विमकिदफिस का प्रतिनिधि शासक था। इस अभिलेख से पता लगता है। कि उसने एक शिव की मूर्ति की स्थापना की। दूसरा अभिलेख तक्षशिला के समीप । कलवान में प्राप्त हुआ है। इससे पता लगता है कि उस समय तक्षशिला के आस-पास । का क्षेत्र कुषाणों के अधीन था। इस वंश के सर्वाधिक शक्तिशाली और विख्यात । शासक कनिष्क के बारे में उसके सिक्के हमें जानकारी देते हैं। उसकी प्रारम्भिक मुद्राएं। प्रकट करती हैं कि वह शुरू में सम्भवतः पारसी था और सूर्य तथा अग्नि की पूजा करता था। उसके शासन के बाद की मुद्राएं इस बात का प्रमाण कि वह बहुत उदार हो गया और उसने यूनानी, भारतीय और बेबीलोनिया के देवताओं की मूर्तियाँ भी। अपने सिक्कों पर जारी कीं । बौद्ध साहित्य द्वारा कनिष्क के बौद्ध अनुयायी होने और उस द्वारा चौथे बौद्ध सम्मेलन आयोजित करने के प्रमाण मिलते हैं। पेशावर के स्तूप, कनिष्कपुर नगर के अवशेष और तक्षशिला के समीप सिरमुख नामक नगर और मथुरा में बिना सिर की प्रतिमा इस बात का प्रमाण देती हैं कि कनिष्क महान वास्तुकला और मूर्तिकला का संरक्षक था। कनिष्क के उत्तराधिकारी वासिष्क के बारे में केवल एक उत्कीर्ण लेख हमें जानकारी देता है। साँची में प्राप्त एक लेख भी यह बताता है। वह विदिशा को अपने अधीन कर सका। उसके उत्तराधिकारी कनिष्क द्वितीय के बारे में। पेशावर जिले में अटक से 10 मील दूर आरा नामक स्थान से प्राप्त एक अभिलेख । जानकारी मिलती है। उसके नाम के साथ रोमन राजाओं की उपाधियों का प्रयोग इस बात का सूचक है कि अब रोमन साम्राज्य से भारत के घनिष्ठ व्यापारिक सम्बन्ध हो गए थे। कनिष्क द्वितीय के बाद हुविष्क के बड़ी संख्या में सिक्के भारत और अफगानिस्तान से प्राप्त हुए हैं जिससे यह पता लगता है कि उसके काल में भी कुषाण साम्राज्य बहुत बड़ा था। उसके उत्तराधिकारी वासुदेव के सिक्कों पर बनी शिव और नन्दी की मूर्तियाँ बताती हैं कि उसने हिन्दू धर्म को ग्रहण कर लिया था।
| (द) गुप्त वंश का इतिहास जानने के स्रोत–गुप्तकाल इतिहास के निर्माण में । अनेक स्रोत सहायता देते हैं जिनमें साहित्यिक, विदेशी यात्रियों के विवरण, अभिलेख, । सिक्के, मोहरें और स्मारक प्रमुख हैं। धार्मिक साहित्य में पुराण विशेषकर वायु पुराण, । विष्णु पुराण, मत्स्य पुराण और भागवत पुराण गुप्तकालीन इतिहास के निर्माण में । अत्यधिक सहायक हैं। ये ग्रन्थ प्रारम्भिक गुप्त राजाओं एवं अनेक साम्राज्य की । सीमाओं की जानकारी देते हैं। धर्मेत्तर साहित्य में कालिदास द्वारा रचित रघुवंश तथा । अभिज्ञान शाकुन्तलम् दो ऐसे ग्रन्थ हैं जिनसे गुप्तकालीन इतिहास पर महत्त्वपूर्ण प्रकाश । पड़ता है। गुप्तकाल में वात्स्यान द्वारा काम-सूत्र की रचना की गई। इस ग्रन्थ से उस । काल के आचार, व्यवहार, भोजन, वस्त्र, आभूषण इत्यादि के बारे में प्रचुर सामग्री प्राप्त । होती है। 

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