प्रश्न 34. हिन्द-यूनानी राजा डिमेट्रियस के जीवन और उपलब्धियों के बारे में आप क्या जानते हैं? भारतीय संस्कृति पर यूनानियों के प्रभाव के बारे में विचार कीजिए।

प्रश्न 34. हिन्द-यूनानी राजा डिमेट्रियस के जीवन और उपलब्धियों के बारे में आप क्या जानते हैं? भारतीय संस्कृति पर यूनानियों के प्रभाव के बारे में विचार कीजिए।


एक अन्य साक्ष्य के अनुसार जो कार्य सिकन्दर नहीं कर सका। वह मेनाण्डर ने किया। जो भी ऐतिहासिक प्रमाण रहे हों । लेकिन यह वास्तविकता है कि डिमेट्रियस काफी लम्बे समय तक बैक्ट्रिया से बाहर रहा । इसी बीच बैक्ट्रिया के राज्य से भी उसे हाथ धोना पड़ा। एण्टिओकस चतुर्थ के सम्बंधी यूक्रेटाइडस ने जनता के विद्रोह की अगुवाई की। डिमेट्रियस इस विद्रोह का सामना करने में असमर्थ रहा। यही नहीं, यूक्रेटाइडस ने भारतीय म में भी डिमेट्रियस का पीछा किया। और उसके राज्य का कुछ भाग अपने अधिकार में ले लिया। इस भाग के निकल जाने के बाद डिमेट्रियस के पास केवल पंजाब का पूर्वी भाग ही रह गया। इस प्रकार डिमेट्रियस ने अपनी कुशलता और प्रतिभा के आधार पर भारत में कुछ भाग पर अपना राज्य स्थापित किया था अब यूक्रेटाइडस की प्रतिद्वन्द्विता के कारण इण्डो-ग्रीक राजघरानों में विभक्त हो गया।
डेय के भारत आक्रप पर डॉ. राजबली पाण्डेय के विचार - डिमेट्रियस की योजना थी, कि मगध साम्राज्य के मुख्य सैनिक और राजनीतिक केन्द्रों पर एक साथ आक्रमण कर सारे उत्तर भारत पर अपना अधिकार जमा ले। इस योजना की पूर्ति हेतु उसने लगभग 303 ई. पू. में अपने दो सेनापतियों मेनाण्डर और अपोलोडोटस के साथ भारत पर आक्रमण किया। इसने अपने आक्रमण का ऐसा अवसर चुना। जबकि मौर्यों का अन्त हुआ था। और शुंग भी अपनी केन्द्रीय शक्ति को स्थिर नहीं कर पाये थे । अर्थात् अस्थिरता का वातावरण था । बौद्ध संस्थाएँ मौर्य शासन के प्रश्न पर शृंगों से विरोध और असन्तोष प्रकट कर रही थी। तक्षशिला पहुँचकर डिमेट्रियस ने अपनी सेना को दो टुकड़ों में विभक्त कर दिया। सेना का एक भाग मेनाण्डर के नेतृत्व में शाकल, मथुरा, पांचाल, साकेत और पाटलिपुत्र को जीतने के लिए पूर्व भेजा गया। और दूसरा भाग सिन्धु नदी के रास्ते से अवन्ति, माध्यमिका, विदिशा जीतकर मथुरा पहुँच जाने के लिए अपोलोडोटस के नेतृत्व में चला । ग्रीक सेना बड़ी तीव्रता से कुछ को छोड़कर ऊपर के नगरों में पहुँच गयी। पुष्यमित्र के मित्र एवं समकालीन व्याकरणाचार्य पातंजलि ने अपने महाभाष्य में लिखा है कि “यवन ने साकेत (अयोध्या) को घेरा, यवन ने माध्यमिका (चित्तौड़ के पास नगरी) को घेरा।” पातंजलि के महाभाष्य से डिमेट्रियस के भारत पर आक्रमण का विस्तृत उल्लेख गार्गी संहिता के युग पुराण में मिलता है। इसके पश्चात् साकेत, पांचाल और मथुरा को जीतकर दुष्ट किन्तु, लड़ाकू ग्रीक पाटलिपुत्र पहुचेंगे । युद्ध में कठिनाई से युद्ध करने योग्य यवन मध्य देश में ठहरेंगे नहीं। उनमें परस्पर अवश्य ही वैमनस्य होगा जिससे उनके अपने ही राज्यों को उखाड़ देने वाला परम दारुण और घोर युद्ध होगा।”
| शुगों ने मध्यदेश में अपनी परिस्थिति शीघ्र सुधार ली और यवनों को यहाँ ठहरने न दिया । शुगों ने यवनों का भारत की पश्चिमोत्तर सीमा तक पीछा किया। कालिदास के मालविकाग्निमित्र में उल्लेख है “कि पुष्यमित्र शुंग का पौत्र वसुमित्र तक शृंगों की सेना के साथ पश्चिमी भारत में चक्कर लगा रहा था, जब यवनों ने अश्वमेघ का घोड़ा पकड़ लिया तो घोर युद्ध में यवनों को पराजित कर वसुमित्र घोड़ा वापस लाया।” यहाँ ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि विदिशा में शृंगों की शक्ति के कारण यवन सेना अवन्ति छोडकर माध्यमिका पहँची । लेकिन जो सेना मथुरा में थी । उससे वह कोई सम्पर्क न रख सकी । इस तरह मध्य प्रदेश, मध्य भारत, राजस्थान और पूर्वी पंजाब में यवनों के पैर नहीं जम सके। परन्तु सीमान्त पश्चिमी पंजाब और सिन्धु में डिमेट्रियस ने अपना अधिकार स्थापित कर लिया है। इन प्रान्तों में यवन सफलता के निम्नलिखित कारण थे।
(1) दूरी के कारण इन प्रान्तों में शुगों की पर्याप्त शक्ति का अभाव । (2) जनता में विदेशी तत्त्व की यवनों से सहानुभूति । (3) बौद्धों में शुंगों के प्रति असन्तोष और यवनों से सहयोग ।।
इन अधिकृत प्रदेशों में डिमेट्रियस ने अपने एवं अपने पिता के नाम पर कई यूनानी उपनिवेश व नगर बसाये । जैसे यूथेडीमिया एवं दत्तामित्री आदि। अपने इन विजित भारत के भागों में दो भाषी सिक्के चलाए । जि: एक ओर यूनानी भाषा और लिपि एवं दूसरी ओर प्राकृत भाषा और खोष्टी लिपि में राजा का नाम और उपाधियाँ लिखी हैं।
डॉ. एन. एन. घोष के विचार - डिमेट्रियस के भारत आक्रमण के विषय में डॉ. एन. एन, घोष अपने विचार व्यक्त करते हुए लिखते हैं कि “दिमेत्र या डिमेट्रियस निश्चित रूप से भारत का सर्वप्रथम यवन विजेता था । किन्तु उसने अपने आक्रमण में भारत का कितना भाग जीता इस विषय में मतभेद है। प्राचीन इतिहासकारों के अनुसार डिमेट्रियस का राज्य कम से कम शाकल तक विस्तृत था जो ग्रीको-रोमन परम्परा का यूथोडीमिया ही प्रतीत होता है जिसे दिमेत्र या डिमेट्रियस ने अपने पिता की स्मृति में बसाया था। इस तरह उसके शासन क्षेत्र में पंजाब और सिंधु घाटी के क्षेत्र भी आते हैं। सिद्धान्त कौमुदी में सौवीर प्रदेश में दत्तामित्री नगरी के उल्लेख के आधार पर दक्षिण में उसके राज्य का विस्तार सौवीर प्रदेश तक भी माना। जाता है ।
डॉ. घोष आगे लिखते हैं कि “जो इतिहासकार एक ही यवन आक्रमण की धारणा में विश्वास करते हैं। वे डिमेट्रियस के विजित क्षेत्र में साकेत, माध्यमिका और पाटलिपुत्र तक के क्षेत्रों को भी सम्मिलित करते हैं, क्योंकि इन सभी स्थानों का उल्लेख पातंजलि के महाभारत और गार्गी संहिता में आता है। कुछ विद्वान् खारवेल के हाथी गुम्फा अभिलेख में भी दिमेत्र या डिमेट्रियस का नाम पढ़ते हैं। यह धारणा अब अविश्वसनीय ही लगती है। विजय क्षेत्र के इस विस्तार का अर्थ ये विद्वान यह बिल्कुल भी नहीं लगाते कि डिमेट्रियस ने इतने विशाल क्षेत्र पर शासन किया। उनका कहना है कि यूक्रेटाइडिस की प्रतिद्वन्दिता के कारण उसे अपनी मध्य देशीय विजयों का विचार अपने मस्तिष्क से निकालकर केवल शाकल प्रदेश तक स्वयं को सीमित रखा। नई पीढ़ी के इतिहासकार ए. के. नारायण उपरोक्त दोनों धारणाओं के विरुद्ध अपने मतानुसार सिन्धु नदी के इस पार के क्षेत्र की विजय का श्रेय डिमेट्रियस को देने को तैयार नहीं हैं। अपने तर्क के आधार पर श्री नारायण जोर देकर कहते हैं कि डिमेट्रियस प्रथम का एक भी सिक्का सिन्धु नदी के पूरब में नहीं मिलता। अतः उसका राज्य और विजयें दोनों ही सिन्धु नदी के पश्चिम तक ही सीमित थी । डिमेट्रियस को भारत का प्रथम विजेता इसलिए कहा गया क्योंकि उसके समय सिन्धु के पश्चिम के चार प्रान्त एशिया, अराकोशिया, पैरोवमीसडाई और जेड्रोशिया मौर्य साम्राज्य के अंग होने के कारण भारतीय क्षेत्र ही माने जाते रहे होंगे।” |

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