नहपान की उपलब्धियों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखो।

नहपान की उपलब्धियों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखो। 

Write a short note on Nahapana's achievements.

 रुद्रदामन की उपलब्धियाँ का वर्णन कीजिए और शक इतिहास में उसका स्थान निर्धारित कीजिए?

Describe the achievement of Rudradaman and determine his place in Saka history.

(i) चष्टन (Chashtan)- 

चष्टन उज्जैन का प्रथम शक शासक था। उसके पिता ने उसके वंश की प्रतिष्ठापना अवश्य की थी। परन्तु उज्जैन में अपने वंश का शासन प्रारम्भ करने वाला चष्टने ही था। उसने अपने अभिलेखों में शक सम्वत् का प्रयोग किया है जिसके अनुसार इस वंश का राज्य 130 ई. से 388 ई. तक चला। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि 388 ई. में ही चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने उज्जैनी के शकों को समाप्त किया। प्रो. जे. डुब्रोआ के मतानुसार चष्टन का राज्य 78 ई. में प्रारम्भ हुआ और उसने शक सम्वत् की स्थापना की। कुछ विद्वान उसके राज्यकाल के वर्ष के आधार पर उसे कुषाणों का क्षत्रप मानते हैं। डॉ. नाहर के अनुसार नहपान की मृत्यु के बाद ऐसा प्रतीत होता है कि दक्षिणी पश्चिमी भागों का उपशासक कुषाणों ने चष्टन को ही नियुक्त कर दिया और उसे सातवाहनों से अपने शासनान्तर्गत उन भागों को पुनः अधिकार में करने का आदेश भी दिया जो नहपान के समय में गौतमी पुत्र शातकर्णि ने जीत लिए थे। 130 ईसवी का एक अभिलेख कच्छ के अन्धऊ नामक स्थान पर मिला है। उस समय की प्रथा के अनुसार महाक्षत्रप का पुत्र क्षत्रप का पद धारण करके अपने पिता की सहायता करता था । जब अपनी वृद्धावस्था में चष्टन एक महाक्षत्रप हो गया तो उसने अपने पुत्र जयदामन को क्षत्रप नियुक्त कर दिया।
(ii) चष्टन के पुत्र जयदामन के समय में गौतमीपुत्र शातकर्णि ने अवन्ति को अपने अधीन कर लिया इसीलिए जयदामन केवल अधीन क्षत्रप रहा और महाक्षत्रप नहीं हो पाया।

(iii) रुद्रदामन (Rudradamana)-

चष्टन के पश्चात् रुद्रदामन शासक हुआ जो भारतीय इतिहास और साहित्य में महाक्षत्रप रुद्रदामन के नाम से विख्यात है। रुद्रदामन एक अत्यन्त पराक्रमी और प्रतिभा सम्पन्न शासक हुआ। वह उज्जैन के शक क्षत्रपों में सर्वप्रसिद्ध था जिसने अपने वंश की शक्ति और प्रतिष्ठा में बहुत वृद्धि की । उसने 130 ई. से 150 ई. तक राज्य किया। जूनागढ़ स्थित उसके शिलालेख में उसके जीवन और कार्यों के बारे में विवरण दिया हुआ है । इसी अभिलेख से प्रतीत होता है कि उसने महाक्षत्रप की उपाधि स्वयं प्राप्त की थी। जिससे यह संकेत प्राप्त होता है कि उसके राजकुल का प्रभाव कुछ पल के लिए समाप्त हो गया था अर्थात् चष्टन वंश को कुछ समय के लिए ग्रहण लग गया था। अतः रुद्रदामन अपने वंश की शक्ति की पुनः स्थापना में सफल हुआ । इन सब कार्यों से स्पष्ट है। कि रुद्रदामन बड़ा पराक्रमी और विजयी राजा था। जूनागढ़ अभिलेख से यह भी आभास मिलता है कि उसने कुषाणों का आधिपत्य मानना छोड़ दिया था।

रुद्रदामन की उपलब्धियाँ–

निः सन्देह रुद्रदामन एक पराक्रमी और वीर शासक था। उसने अपने पराक्रम से अपने वंश की खोई पतिष्ठा को पुनः प्राप्त किया। रुद्रदामन युद्ध कार्यों एवं प्रजाहित कार्यों में समान रूप से महान् था । उसने अपने पराक्रम से अपने साम्राज्य को काफी विस्तृत किया। इसकी उपलब्धियों को निम्न प्रकार वर्णित किया जा सकता है। | (1) युद्ध के क्षेत्र में उपलब्धि अथवा वह एक विजेता के रूप में रुद्रदामन द्वारा महाक्षत्रप पद धारण कर लेने से यह आभास मिलता है कि उसने कुषाणों का आधिपत्य मानना छोड़ दिया। जूनागढ़ अभिलेख से विदित होता है कि रुद्रदामन ने दक्षिण पथ के स्वामी शातकर्णि को दो बार परास्त किया और फिर इसे अपना दामाद बना लिया। अभिलेख से यह भी स्पष्ट है कि रुद्रदामन ने दक्षिणी पंजाब में गर्वशाली और वीर योद्धाओं को भी परास्त किया। जूनागढ़ अभिलेख से प्रतीत होता है कि रुद्रदामन ने अपनी विजयों से पूर्वी और पश्चिमी मालवा, अनूप, नीमाड़ उत्तरी काठियावाड़ या द्वारका के आस-पास का प्रदेश, दक्षिणी काठियावाड़ या जूनागढ़ के आस-पास का प्रदेश, साबरमती नदी के पास का क्षेत्र, मारवाड़, कच्छ, सिन्धु या निचली सिन्धु नदी के पूर्व और पश्चिम के क्षेत्र, उत्तरी काठियावाड़ के समीप का प्रदेश, उत्तरी कोंकण और निषाद आदि प्रदेशों का स्वामी हो गया।

 जूनागढ़ अभिलेख

 जूनागढ़ अभिलेख में जैसा कि उल्लेख है कि रुद्रदामन ने दक्षिण पथ के राजा शातकर्णि को दो बार परास्त किया लेकिन रुद्रदामन द्वारा शातकर्णि को अपना दामाद बना लेने से वह उसका नाश नहीं कर सका। भण्डारकर का मत है कि यह शातकर्णि स्वयं गौतमी पुत्र शातकर्णि था लेकिन यह मत स्वीकार योग्य नहीं है। गौतमी पुत्र शातकणि ने स्वयं क्षहरात वंशीय सम्राटों को परास्त किया था। रैप्सन महोदय का मत है कि पराजित सातवाहन नरेश वाशिष्ठी पुत्र पुलुभावी था। अपने मत की प्रमाणिकता में उनका कहना है कि पुलुभावी के समय में सातवाहन राज्य संकुचित हो गया था। कुछ इतिहासकार परास्त शातकर्णि को वाशिष्ठीपुत्र पुलुभावी का कोई उत्तराधिकारी मानते हैं लेकिन उसे गौतमी पुत्र शातकणि का कोई उत्तराधिकारी मानना अधिक न्याय संगत प्रतीत होता है। रुद्रदामन की विजयों के बारे में बहुत से इतिहासकार यह मानते हैं कि उसने कनिष्क के उत्तराधिकारियों से सिन्धु, साँचीर प्रान्त जीता था। इस प्रकार उपरोक्त उल्लेख से स्पष्ट होता है कि रुद्रदामन एक पराक्रमी शासक था जिसने अपनी सूझबूझ और भुजबल से अपने साम्राज्य को विस्तृत करने में सफलता अर्जित की ।

(2) एक कुशल तथा सफल शासक–

रुद्रदामन केवल एक विजेता ही नहीं वरन्। एक कुशल शासक भी था । उसने अपने विशाल साम्राज्य को अनेक प्रान्तों में विभक्त किया और प्रत्येक प्रान्त अथवा प्रदेश में अपने अमात्य नियुक्त किये । शासन में सहायता के लिए उसने पार्षद की भी व्यवस्था की । उसने अपने राज्य की राजधानी उज्जैनी को बनाया । वह प्रजा हित का बहुत ध्यान रखता था । जूनागढ़ अभिलेख में कहा गया है कि चन्द्रगुप्त मौर्य और अशोक के समय की बनी हुई सुदर्शन झील रुद्रदामन के समय में टूट गयी थी। इससे बहुत विनाश हुआ, काठियावाड़ की प्रजा में हाहाकार मच गया। उसने बहुत धन खर्च करके गिरिनार तथा आस-पास की भूमि को जल देने वाली सुदर्शन झील की मरम्मत करायी। इस धन राशि के व्यय का भार प्रजा पर नहीं डाला गया प्रजा पर इसके लिए कोई कर नहीं लगाये गये, लोगों से कोई बेगार नहीं ली गई और न ही उन्हें अन्य किसी प्रकार से पीड़ित किया गया।

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