रुद्रदामन की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए और शक इतिहास में उसका स्थान निर्धारित कीजिए?

रुद्रदामन की उपलब्धियों का वर्णन कीजिए और शक इतिहास में उसका स्थान निर्धारित कीजिए?

Describe the achievement of Rudradaman and determine his place in Saka history.
रुद्रदामन प्रथम के जीवन चरित्र एवं उपलब्धियों का निरूपण कीजिए।
Sketch the career and achievement of Rudradaman I.


(3) संस्कृत भाषा और साहित्य का आश्रयदाता–

रुद्रदामन वैदिक धर्म का अनुयायी तथा संस्कृत भाषा तथा साहित्य का आश्रयदाता था । यद्यपि वह भारत में बसा हुआ एक विदेशी था तथापि उसने संस्कृत का प्रथम बड़ा अभिलेख प्रांजल भाषा में प्रसारित किया। उसके पहले के जो भी अभिलेख इस देश के मिले हैं वे प्राकृत भाषा में हैं। वह अपना शासन मंत्रिपरिषद् की सहमति से जिसके सदस्य वाँछनीय योग्यता वाले थे चलाता था। राज्याभिषेक से पूर्व उसे समुचित शिक्षा मिली थी। जिससे वह व्याकरण (शब्द विद्या) धर्मशास्त्र । (अर्थ विद्या) तर्क शास्त्र (न्याय विद्या) संगीत शास्त्र (गन्धर्व विद्या) आदि का पूर्ण ज्ञाता बन् गया। |

(4) उत्कृष्ट चरित्र का धनी 

जूनागढ़ अभिलेख में रुद्रदामन के चरित्र की एक सच्ची कसौटी एवं उसके शासन की सुसंस्कृत दशा का वर्णन इस कथन में मिलता है कि उसने यह शपथ ले रखी थी कि युद्ध के अतिरिक्त वह कभी भी मनुष्यों की हत्या नहीं करेगा जिसको उसने जीवन्त पर्यन्त निभाया । रुद्रदामन के सचिव दो वर्गों में विभक्त थे-मतिसचिव जिन्हें परामर्शदाता कहा जाता था तथा दूसरा वर्ण कर्म सचिव अथवा शासक वर्ग । सुदर्शन झील की मरम्मत के लिए राजकोष से आर्थिक मदद देने का परामर्शदाता सचिवों ने विरोध किया था इन मंत्रियों के परामर्श का उसे सम्मान करना पड़ा। इसी कारण बाँध के बँधवाने में जो खर्च हुआ उसे रुद्रदामन ने अपनी जेब से दिया। इससे सम्राट तथा उसके अमात्यों एवं राजकोष की वैधानिक स्थिति पर अच्छा प्रकाश पड़ता है। इस उदाहरण से यह भी स्पष्ट होता है कि वह अपनी प्रजा के सुख के लिए सदैव चिन्तित रहता था तथा शासन के कार्यों में विधान का सम्यक् पालन करता था। वह अपने जीवनकाल में कभी तानाशाही प्रवृत्ति का नहीं रहा। उसने संवैधानिक शासक की भाँति व्यवहार किया। इसी कारण सभी जातियों ने रुद्रदामन को अपना रक्षक निर्वाचित किया ।

रुद्रदामन के उत्तराधिकारी (Rudradaman's successors)

 रुद्रदामन के पश्चात्  इस वंश के अनेक राजाओं ने राज्य किया । परन्तु उनके विषय में अधिक जानकारी नहीं मिलती । रुद्रदामन के पश्चात् उसको पुत्र दामोजदश्री महाक्षत्रप हुआ। इसके पश्चात् उसके पुत्र दीवरामन तथा भाई रुद्रसिंह प्रथम में गद्दी के लिए संघर्ष हुआ । रैप्सन के अनुसार रुद्रसिंह और जीवदामा में गृहयुद्ध हुआ और इस प्रथम संघर्ष में रुद्रसिंह विजयी हुआ। इस कारण शक राज्य कमजोर पड़ गया और कुछ समय के लिए आभीर प्रबल हो गये। डॉ. राय चौधरी के अनुसार रुद्रसिंह के बाद उसका पुत्र रुद्रसेन प्रथम शासक बना ।

महाक्षत्रप जीवदामन

 जीवदामन के कुछ सिक्के हैं जिन पर एक मुद्रा लेख है कि ये सिक्के महाक्षत्रप जीवदामन ने चलाए। कुछ इतिहासकारों का यह भी कहना है कि दामोजद श्री के पुत्र जीवदामन के राज्य से तिथि वाले सिक्के शुरू होते हैं। इस समय के बाद चाँदी के सिक्कों में मुख भाग पर शासक के सिर के पीछे उनके निकलने का वर्ष ब्राह्मी अंकों में दिया गया है । जीवदामन के तिथि वाले कुछ सिक्के पोरिन के बने हुए हैं। लगभग 178 ई. में जीवदामन् महाक्षत्रप बना और 181 ई. में रुद्रसिंह प्रथम महाक्षत्रप हुआ । इस बीच उथल पुथल मचती रही और 191 ई. के लगभग रुद्रसिंह प्रथम पुनः महाक्षत्रप बना तथा लगभग 196 ई. तक स्वयं शासन करता रहा । लेकिन ये सब महाक्षत्रप रुद्रदामन की कीर्ति को स्थिर नहीं रख सके। रुद्रदामन के ये और अन्य उत्तराधिकारी दुर्बल सिद्ध हुए और अपने राज्य को अक्षुष्ण नहीं रख सके । तीसरी शताब्दी के पूर्वाद्ध में आभीरों ने उनकी शक्ति को बहुत कुछ क्षीण कर दिया ।

क्षत्रप रुद्रसिंह तृतीय

उज्जैन का अन्तिम शक क्षत्रप रुद्रसिंह तृतीय था उसने 388 ई. तक राज्य किया । फिर भी शक क्षत्रप गुप्तकाल तक किसी न किसी रूप में शासन करते रहे हालांकि उनके राज्य का बहुत सा भाग नागों और मालवा के हाथों में जाता रहा। चतुर्थ शताब्दी ई. के अन्त में गुप्त सम्राट चन्द्रगुप्त द्वितीय विक्रमादित्य ने मालवा और काठियावाड़ को जीत लिया और शकों की सत्ता का अन्त कर दिया। । मूल्यांकन शक क्षत्रपों ने ईसा की पहली, दूसरी और तीसरी सदी में भारत के विभिन्न भागों पर शासन किया। इस बीच वे भारतीय संस्कृति के सम्पर्क में आये और उसमें घुल-मिल गये । शकों का प्रभाव भी भारतीय संस्कृति पर पड़ा। इस समय की एक और विशेषता यह थी कि भारतीय समाज बड़ा उदार था।

वैवाहिक संबंध

शक व पल्हव आदि विदेशी जातियाँ भारतीय संस्कृति में विलीन हो गयी। उन्होंने भारतीय धर्मों को अपना लिया । ये पूर्ण रूप से हिन्दू बन गये एवं हिन्दू सामाजिक व्यवस्था में समा गये, कालान्तर में यह अन्तर ही नहीं रहा कि वे विदेशी थे, उन्होंने हिन्दुओं के साथ विवाह सम्बन्ध किये । रुद्रदामन ने अपनी कन्या का विवाह सातवाहनों से किया। इन लोगों ने भारतीय नाम ग्रहण किये। भूमक और नहपान विदेशी नाम थे परन्तु नहपान की पुत्री का नाम दक्षमित्रा था और नहपान का शक जामाता ऋषभदत्त नाम और धर्म दोनों में ही पूर्ण भारतीय हो गया। इसी तरह जामोतिक और चष्टन विदेशी नाम थे परन्तु चष्टन के पुत्र और पौत्र क्रमशः जयदाम और रुद्रदामन् भारतीय नाम धारण करके पूर्ण भारतीय हो गये । शकों ने प्रचलित क्षेत्रीय भाषाएँ अपनाईं किन्तु संस्कृत को राजभाषा बनाया। उज्जैनी के क्षत्रपों ने संस्कृत को प्रोत्साहन दिया, रुद्रदामन का जूनागढ़ अभिलेख शुद्ध संस्कृत में है। इस काल में राजाधिराज के सामने राज्य की उपाधि इतनी छोटी हो गयी कि उसे नहपान और चष्टन जैसे स्वतंत्र क्षत्रप भी धारण करने लगे।

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