सातवाहन कौन थे ? सातवाहन वंश के लिए गौतमी पुत्र शतकर्णि की सेवाओं का मूल्यांकन कीजिए।

सातवाहन कौन थे ? सातवाहन वंश के लिए गौतमी पुत्र शतकर्णि की सेवाओं का मूल्यांकन कीजिए।


Who were the satavahans ! Evaluate the services of Gautami putra Satakarni to the Satavahan dynasty.

चकोर के बाद 78 ई. में शिवस्वाति नामक राजा गद्दी पर बैठा उसने 28 वर्ष तक राज्य किया। शिवस्वाति के पश्चात् 106 ई. में गौतमी पुत्र शातकर्णि नामक राजा सिंहासन पर बैठा । गौतमी पुत्र शातकर्णि से सातवाहन साम्राज्य के उत्थान का युग प्रारम्भ होता है। यह महत्त्वाकांक्षी राजा इस वंश का सर्वप्रसिद्ध शासक था जिसने इस साम्राज्य के विपत्तिग्रस्त राज्य को ही नहीं बचाया अपितु विस्तृत प्रदेशों को भी अपने साम्राज्य में सम्मिलित किया।

गौतमी पुत्र शातकर्णि का जीवन वृत्त—

शातकर्णि प्रथम के पश्चात् 100 वर्षों के पराभव काल के व्यतीत हो जाने के पश्चात् गौतमी पुत्र शातकर्णि नामक राा हुआ । पुराणों के अनुसार यह सातवाहन वंश का 23 वाँ राजा था। प्रसिद्ध इतिहासकार नीलकण्ठ शास्त्री के ग्रंथ दक्षिण भारत के इतिहास के अनुसार खारवेल के हाथी गुम्फा अभिलेख में जो शातकर्णि प्रथम का उल्लेख है वह सम्भवतः गौतमी पुत्र शातकर्णि ही है। जो भी हो गौतमी पुत्र शातकर्णि के शासनकाल में सातवाहन वंश ने अपनी खोई हुई प्रतिष्ठा को पुन: स्थापित किया । उसने स्वयं को एक मात्र ब्राह्मण कहा । गौतमी पुत्र का युग सातवाहनों के पुनरुत्थान का युग था ।। सातवाहन वंश के इस सर्वप्रसिद्ध शासक ने वंश के विपत्तिग्रस्त भाग्य को ही नहीं बचाया । वरन् प्रदेशों को भी सातवाहन साम्राज्य में सम्मिलित किया। इस सातवाहनों के परम् प्रतापी नरेश को शकों, यवनों और पल्हवों का विनाशकर्ता कहा गया है। |

गौतमी पुत्र शातकर्णि 

गौतमी पुत्र शातकर्णि के नाम की सार्थकता के विषय में विभिन्न इतिहासकारों ने अपने अपने मत दिये हैं। यह भी कहा जाता है कि सातवाहन कुल में सबसे पहले गौतमी पुत्र ने ही मातृपरक नाम धारण किया और बाद के कुछ सम्राटों ने भी इस परम्परा का निर्वाह किया । इतिहासकार फ्रेजर का अनुमान है कि सातवाहनों में मातृपरक नाम रखने की परम्परा केवल विवाह की व्यवस्था को चालू करने के लिए की गई थी न कि सम्पत्ति के लिए । परन्तु ठोस प्रमाणों के अभाव में इस मत को स्वीकार नहीं किया जा सकता । यह मातृपरक नाम वैदिक गोत्रों पर आधारित है। गौतमी पुत्र का अर्थ गौतमी नामक किसी स्त्री का पुत्र हो सकता है या गौतम गोत्र की किसी स्त्री का पुत्र भी हो सकता है। गौतम एक वैदिक ऋषि थे। सातवाहनों के सामन्तों ने भी मातृपरक नाम धारण किये थे। जैसे महारणी, गोतिपुत्र, महाभोज, कोचिपुत्र, भाढरीपुत्र, आमीर, ईश्वरसेन आदि । वेदों में भी कौशिकीपुत्र, कात्सीपुत्र, आलम्बीपुत्र, वैयग्रहपदी पुत्र आदि नाम प्राप्त होते हैं। पालिग्रंथों में अजातशत्रु को वैदेही पुत्र कहा गया है । डॉ. गोपालाचारी ने एक बात और सुझायी है कि मातृपरक नाम अधिकांश मालवा प्रदेश से प्राप्त होते हैं। ये मातृपरक नाम पवूर्णवर्ती सातवाहन सम्राट धारण नहीं करते थे।

(ख) सिंहासना रोहण एवं राज्य विस्तार-

शिवस्वाति के पश्चात् 106 ई. में गौतमी पुत्र शातकर्णि नामक राजा सिंहासन पर बैठा। यह सातवाहन वंश के सबसे महान् राजाओं में से एक था। उसने शकों को हराया और अनेक क्षत्रिय राजाओं का नाश किया। इस पराक्रमी सम्राट का इतिहास इसकी माता गौतमी बलश्री के नासिक गुहालेख से विदित होता है । इस लेख के अनुसार गौतमीपुत्र अद्वितीय धनुर्धर और शूर ब्राह्मण था जिसके वाहनों ने तीन समुद्रों का जल पिया था। जिसने क्षत्रियों के दर्प और मान का मर्दन किया था। जिसने क्षहरात वंश का अन्त किया और सातवाहन वंश के यश में वृद्धि की । उसका शत्रु नहपान इसी वंश का था। नहपान के जो दो हजार से भी अधिक चाँदी के सिक्के नासिक के पास मिले हैं। उन पर फिर से ढालने के चिन्ह हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि गौतमी पुत्र शातकर्णि का साम्राज्य उत्तर में मालवा से लेकर दक्षिण में कर्नाटक तक फैला हुआ था । एक अभिलेख के आधार पर यह कहा जा सकता है कि उसका राज्य ऋषिक, गोदावरी और कृष्णा नदी के बीच का प्रदेश, अश्मक (गोदावरी का तटवर्ती प्रान्त) मूलक (पैटन के आसपास का भू-भाग), सुराष्ट्र, कुकुर (उत्तर काठियावाड़), अपरान्त (उत्तरी बम्बई) अनूप (नर्मदा का ऊपरी भाग), विदर्भ (बरार) आकर (पूर्वी मालवा), अवन्ति (पश्चिमी मालवा) तक फैला था । सम्भवतः आन्ध्र पर भी उसका अधिराज्य था । उसने 106 ई. से 130 ई. तक शासन किया।

साम्राज्य विस्तार-

नासिक के वाशिष्ठी पुत्र के एक गुहालेख के अनुसार गौतमी पुत्र के लिए विश्लेषण के रूप में जो उल्लेख मिलता है। उससे उसके साम्राज्य विस्तार का अनुमान लगाया जा सकता है। जो निम्न प्रकार है “हिमवत मेरु मन्दर पर्वत सम सारस असिक मुलक सुरठ। ककुरोपरान्त अनुप विदर्भ आकरावन्ति राजस विझछवत पारिचात सहृदय कन्हगिरि मय सिरिटन मलय महिद सेटगिरि चकोर पवत पतिस।”
| यदि उक्त विवरण पर विश्वास कर लिया जाये तो मानना पड़ेगा कि गौतमी पुत्र शातकर्णि ने एक विशाल साम्राज्य पर अधिकार कर लिया था। वाशिष्ठ पुत्र पुलुभावि के उसी अभिलेख में गौतमी पुत्र को सातवाहन कुल यश प्रतिष्ठापन कर कहा है। जो केवल गर्व से कही हुई बात नहीं लगती । कैम्बेज हिस्ट्री ऑफ एनसियेंट इन्डिया (Volum I) में रेप्सन ने इन सारे प्रदेशों को उसके राज्य का विस्तार नहीं माना है। उसके अनुसार ये उन प्रदेशों के नाम हैं जिन्होंने स्वयं गौतमी पुत्र के सम्मुख समर्पण किया था। उसके राज्य का विस्तार विन्ध्य मेखला । सतपुड़ा की पहाड़िया, सम्पूर्ण पश्चिमी घाट तक प्रतीत होता है। गौतमी पुत्र के आन्ध्र प्रदेश पर आधिपत्य का कोई अभिलेखीय साक्ष्य नहीं है।

(ग) विजयें (Victory) - 

उस समय के प्राप्त सिक्कों के आधार पर इतिहासकारों का कथन हैं कि गौतमीपुत्र शातकर्णि ने शकों, यवनों, पल्हवों तथा क्षहरातों का अन्त कर सातवाहन वंश के गौरव की पुनःस्थापना की । इसकी माता गौतमी बलश्री के नासिक अभिलेख के अनुसार गौतमी पुत्र अद्वितीय धनुर्धर और शूर ब्राह्मण था जिसके वाहनों, जिसमें घोड़े एवं हाथी सम्मिलित थे, ने तीन समुद्रों पूर्वी समुद्र अर्थात् बंगाल की खाड़ी, पश्चिम समुद्र अर्थात् अरब सागर तथा दक्षिणी समुद्र अर्थात् हिन्द महासागर का जल पिया था। जिसने क्षत्रियों के दर्प और मान का मर्दन किया था, जिसने क्षहरात वंश का नाश किया और जिसने सातवाहन कुल के यश का प्रतिष्ठान किया। उसने उषावदात तथा नहपान को पराजित कर उसके चाँदी के सिक्कों पर अपना नाम अंकित कराया। सिक्कों के इस ढेर में चाँदी के बहुत से ऐसे सिक्के मिले हैं जो नहपान में चलाये थे और जो दुबारा गौतमी पुत्र शातकर्णि की मुद्रा से अंकित हैं। उसने शकों से उत्तरी महाराष्ट्र और कोंकण, नर्मदा की घाटी और सुराष्ट्र, मालवा और पश्चिमी राजपूताना छीन लिये । 

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