सातवाहनों का पुनरुत्थानः गौतमी पुत्र शातकणि के समय सातवाहनों की शक्ति

सातवाहनों का पुनरुत्थानः गौतमी पुत्र शातकणि के समय सातवाहनों की शक्ति 

(Revival of the Satavahan : Power under Gautamiputra Satakarni.)

सातवाहन–सातवाहन कौन थे ? 

सातवाहन वंश के विषय में जानकारी देने वाले स्रोत पुराण ऐतरेय ब्राह्मण तथा सातवाहन वंश के शासकों के कई अभिलेख हैं। मत्स्य पुराण, वायु पुराण, ब्रह्माण्ड पुराण आदि में सातवाहनों को आन्ध्र या आन्ध्र भृत्य कहा है। सुकथण कर महोदय के अनुसार इस शब्द का अर्थ है ‘आन्ध्र का भृत्य गोपालाचारी का दृष्टिकोण भिन्न है वे आन्ध्र को ही भृत्यु मानते हैं। उनके अनुसार अशोक के अभिलेख में यवनों के साथ ही आन्ध्रों का भी उल्लेख हुआ है। असम्भव नहीं कि आन्ध्र सातवाहन मौर्यो के भृत्य रहे हों। लेकिन डॉ. रैप्सन और स्मिथ ने सातवाहन और आन्ध्र को भिन्न-भिन्न जातियाँ माना है। सातवाहन आन्ध्र के निवासी अवश्य थे किन्तु आन्ध्रों से उनका कोई सम्बन्ध नहीं था। उनका कथन है कि सातवाहनों का मूल देश महाराष्ट्र था उन्होंने आन्ध्र में जाकर वहाँ के मूल निवासियों को पराजित कर उपनिवेश बनाया। उसके पश्चात् शक अमीरों ने सातवाहनों के मूल देश पर कब्जा कर लिया और उनके पास केवल आन्ध्र वाला भाग रह गया । इसलिए वे सात वाहन आन्ध्र कहलाये ।

सातवाहन वंश के शासकों सम्बन्धी अभिलेख

सातवाहन वंश के शासकों के जो अभिलेख प्राप्त हुए हैं उनमें उन्होंने स्वयं को ब्राह्मण बताया है। डॉ. भण्डारकर उन्हें क्षत्रिय बताते हैं। किन्तु ऐतिहासिक साक्ष्यों से अधिकांशत: यही प्रमाणित होता है कि वे ब्राह्मण थे। सातवाहन वंश का नाम बाह्य आक्रमणों के कारण हुआ। सातवाहन दक्षिण और मध्य भारत में मौर्यो के सबसे महत्त्वपूर्ण उत्तराधिकारी थे । मध्य भारत में उन्होंने कण्ववंश से सत्ता छीनी थी।

सातवाहन वंश का सबसे प्रारम्भिक अभिलेख

सातवाहन वंश का सबसे प्रारम्भिक अभिलेख प्रथम शताब्दी ई.पू. का है जब उन्होंने कण्वों को परास्त कर मध्य भारत के भागों में अपनी सत्ता स्थापित की । अपने चरमोत्कर्ष के समय सातवाहन साम्राज्य सम्पूर्ण दक्षिण में छाया रहा और उत्तर भारत में भी शायद मगध तक फैल गया। ईसा बाद की प्रथम और द्वितीय शताब्दियों में गुजरात के शकों के साथ लम्बे युद्धों के फलस्वरूप अन्ततः सातवाहन शासन का अन्त हो गया। तीसरी शताब्दी का प्रारम्भ होते होते सातवाहन साम्राज्य पूर्णतः विलीन हो गया । अन्तिम शासकों के अयोग्य होने से राज्य छिन्न भिन्न हो गया और कालान्तर में उसके मलबे पर अनेक छोटे-छोटे स्वतंत्र राज्यवंशों का उदय हुआ। ये राज्यवंश थे वाकाटक, आभीर, इक्ष्वाकु, पल्हव एवं चुलु। सातवाहनों के उदयकाल के बारे में विद्वानों में पर्याप्त विवाद है और यह भी काफी विवादास्पद है कि उनके शासन का प्रारम्भ कब हुआ।

सातवाहन वंश संस्थापक सिमुक

डॉ. स्मिथ और रैप्सन सातवाहनों के वंश संस्थापक सिमुक का उदयकाल तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व मानते हैं किन्तु हाथी गुम्फा अभिलेख तथा अन्य ऐतिहासिक स्रोतों के आधार पर यह अधिक उपयुक्त लगता है कि सातवाहनों का उदय ई.पू. प्रथम शताब्दी में हुआ। डॉ. राजबली पाण्डेय का मत है कि 28 ई.पू. में सिमुक में मगध पर आक्रमण कर उत्तरी भारत में अपनी सत्ता कायम की । उत्तरी भारत में सातवाहनों की शक्ति अधिक समय तक कायम नहीं रही । मगध पर अधिकार करने के कुछ समय बाद ही उत्तरी भारत पर होने वाले विदेशी आक्रमणों तथा इस भाग में स्थानीय राज्यों के उठने के कारण सातवाहनों का उत्तरी भारत से अधिकार समाप्त हो गया लेकिन दक्षिणी भारत में इनकी शक्ति ई. सन् की तीसरी शताब्दी से मध्यकाल तक चलती रही और वे तत्कालीन भारत की प्रमुख शक्ति के रूप में बने रहे।

सातवाहनों के शासक–

सातवाहन राज्य का संस्थापक सिमुक था । उसने कण्वों तथा शृंगों की शेष शक्ति को समाप्त कर अपना अधिकार स्थापित किया। उसके इस साहसिक कार्यों में अन्य आन्ध्रभृत्य तथा रठिक तथा भोज भी सम्मिलित थे। सिमुक ने राजा बनने पर इन लोगों के पुरस्कृत किया । पुराणों के अनुसार सिमुक ने 23 वर्ष तक शासन किया । जीवन के अन्तिम वर्षों में कुछ क्रूर होकर जैनों के प्रति अत्याचार करने के कारण सिंहासन से हटाकर मार डाला गया । सिमुक के पश्चात उसका भाई कृष्ण (कान्ह) राजा हुआ । जिसके समय में सातवाहन राज्य पश्चिम में नासिक तक फैल गया । कान्ह ने लगभग 18 वर्ष तक शासन किया । कान्ह के पश्चात् श्री शातकर्णि राजा बना उसका राज्य काल भी 18 वर्ष था ।

नानाघाट के अभिलेख

नानाघाट के उद्वत अभिलेखों में केवल सिमुक और शातकर्णि का उल्लेख है। इस अभिलेख में कृष्ण का नाम नहीं है। इससे यह अनुमान लगाया जा सकता है कि शातकर्णि पुराणों में वर्णित कृष्ण का पुत्र न होकर सिमुक का पुत्र था। परन्तु इतिहासकारों को इस बारे में कोई शंका नहीं है कि शातकर्णि के पिता का नाम कृष्ण था और वही उसके बाद राजा बना । कुछ भी हो इसमें कोई सन्देह नहीं कि उसने महाराष्ट्र के महारथी उणक चिरों की कन्या नागनिका से विवाह कर अपना प्रभाव बढ़ा लिया। इसने दक्षिणापथ के अनेक उन प्रदेशों को जो अभी तक सातवाहनों के अधीन नहीं थे जीता और दो बाद अश्वमेघ यज्ञ किया। विदिशा के आसपास मध्य भारत का प्रान्त शातकर्णि के समय में सातवाहनों के अधीन था यह बात साँची के स्तूप से मिले एक उत्कीर्ण लेख से प्रकट होती है। शातकर्णि की मृत्यु के पश्चात् उसकी पत्नी नागनिका उसकी संरक्षिका बनी और उसी की देखरेख में राज्य संचालन होता रहा।

सातवाहन वंश का इतिहास

इससे बाद का लगभग 100 वर्षों का सातवाहन वंश का इतिहास अन्धकारमय है। यद्यपि इन वर्षों के मध्य हकुश्री, सातिश्री, स्कन्द, स्तंभि आदि के नाम मिलते हैं। इसी काल में करीब 78 ई. में शकों का दूसरा आक्रमण भारत पर हुआ और शकों ने महाराष्ट्र से सातवाहनों को खदेड़ दिया। महाराष्ट्र में शकों का जो राजवंश स्थापित हुआ उसका नाम क्षहरात था । निसंदेह क्षहरातों से सातवाहनों का संघर्ष निरन्तर चलता रहा। साहित्यिक स्रोतों के आधार पर कहा जा सकता है कि पहली शती के अन्त अथवा दूसरी शती के आरम्भ में सातवाहन वंश में हाल नाम का राजा हुआ । वृहकथा के लेखक गुर्णाढ्य और संस्कृत व्याकरण के लेखक उसकी राज्य सभा में रहते थे।
सम्राट हाल के पश्चात् पत्रलक नामक राजा हुआ जिसने भी 5 वर्ष ही शासन किया । इसके बाद पुरीन्द्रसेन नामक राजा हुआ जिसने 21 वर्ष शासन किया। इसकी मृत्यु के पश्चात् सुन्दर शातकर्णि और चकोर शातकर्णि नामक राजाओं ने क्रमशः एक वर्ष और छ: महीने शासन किया । इन दोनों राजाओं के समय सातवाहन साम्राज्य की शक्ति और प्रतिष्ठा दोनों ही का अध: पतन हो गया । 

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