Write short notes on the following (i) Gandhar Art. (ii) Mathura Art.

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(i) Gandhar Art.
 (ii) Mathura Art.


भारतीय कलाकारों ने गन्धार कला के माध्यम से मूर्ति निर्माण की जो शिक्षा प्राप्त की उसका एक दूसरे केन्द्र मथुरा में मौलिक और स्वतंत्र रूप से विकास किया। यह कहना सर्वथा अनुचित है कि गान्धार कला अत्यन्त उच्च कोटि की कला है। प्रो. कुमार स्वामी का मानना है कि “गान्धार कला निगूढ़ मिथ्यात्व का आभास देती है तथा उसकी निर्जीव मुद्राएं बौद्ध विचारधारा की आध्यात्मिक शक्ति को अभिव्यक्ति प्रदान नहीं कर पाती । वस्तुतः गान्धार कला की मूर्तियों से निर्जीवता दिखाई देती है तथा उनमें कलाकार की सच्चाई का अभाव दृष्टिगोचर होता है।

 डॉ. निहार रंजन रे के शब्दों में—“ऐसा मालूम पड़ता है कि यह किसी सिद्धहस्त कलाकार द्वारा निर्मित न होकर मशीनों से तैयार की गई है।” । संक्षेप में कहा जा सकता है कि गान्धार कला मथुरा की कला की भाँति आदर्शवादी न होकर यथार्थवादी थी। इसमें बौद्ध धर्म के साथ-साथ ब्राह्मण धर्म सम्बन्धी कुछ विषय भी लिये गये, शनैः शनैः इस शैली में भारतीय प्रभाव बढ़ता गया, इसलिए बाद में बुद्ध की प्रतिमाएं यूनानी राजा या देवता की प्रतिकृति न होकर शुद्ध भारतीय योगी अथवा ऋषि के रूप में प्रकट हुई थी।

(i) मथुरा कला शैली (Mathura Art)- गान्धार के अतिरिक्त मथुरा भी कला का केन्द्र था। मथुरा में जिस शैली का विकास हुआ उसे मथुरा शैली के नाम से जाना जाता है। यह कला शैली गान्धार कला शैली से प्राचीन है । इस कला का उदय साँची, सारनाथ और भरहुत की स्वदेशी कला के सूत्र को लेकर हुआ माना जाता है। ईसा की प्रथम शताब्दी से प्रगति करती हुई इस शैली ने आने वाले समय में उत्तर भारत की मूर्तिकला की शैलियों में श्रेष्ठ स्थान प्राप्त किया। गुप्तकाल की श्रेष्ठ मूर्ति कला को मथुरा शैली का ही विकसित रूप माना जाता है। मथुरा कला शैली की समस्त कृतियाँ आसानी से पहचानी जा सकती हैं। इस कला शैली में बनाई गई मूर्तियों की निम्नलिखित विशेषताएं हैं।

(1) मथुरा शैली की निर्मित मूर्तियाँ लाल बलुए पत्थर की हैं।
(2) इन मूर्तियों में आध्यात्मिकता नहीं है और इनमें विशालता और भौतिकवादिता अधिक है।
 (3) बुद्ध की ज्यादातर मूर्तियाँ गंजे सिर एवं बिना मूंछों वाली हैं। बालों और मूंछों रहित मूर्तियों के निर्माण की कला विशुद्ध रूप से भारतीय है।
(4) इन मूर्तियों का एक कॅधा ढंका है और दूसरा खुला अर्थात् मथुरा की कुषाण कालीन मूर्तियों के दाहिने कंधे पर वस्त्र नहीं रहता । दाहिना हाथ अधिकांशत: अभये मुद्रा में पाया जाता है।
(5) कला में महात्मा बुद्ध को बहुधा पद्मासन या कमलासन में दिखाया गया है किन्तु मथुरा की मूर्तियों में सिंहासन पाया जाता है।
(6) भगवान बुद्ध से सम्बन्धित मूर्तियों के मुख के चारों ओर प्रभामण्डल है।
(7) प्रायः सभी मूर्तियाँ दो वस्त्र धारण किये हुए हैं ऊपरी और निचले धड़ से सम्बन्धित
(8) सभी मूर्तियों के वस्त्र उनके शरीर से चिपटे हुए दिखाये गये हैं।
(9) मथुरा शैली में यक्ष-यक्षिणी इत्यादि की कामुकता को (मूर्तियों के माध्यम से) अधिक दिखाया गया है।

मथुरा के अजायबघर में सुरक्षित सम्राट कनिष्क की मूर्ति, बनारस के अजायबघर में सुरक्षित हाथ में श्रृंगारदान लिए एक दासी की मूर्ति और मथुरा तथा उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में प्राप्त बुद्ध और बोधिसत्वों, यक्ष-यक्षणियों तथा स्त्री-पुरुषों की विभिन्न मूर्तितयाँ इस कला शैली के अनुपम नमूने हैं। दूसरी सदी के आरम्भ में इस कला पर कुछ प्रभाव गान्धार कला का और सम्भवतया कुछ प्रभाव रोमन कला का भी पड़ा था । सम्राट कनिष्क की मूर्ति आकार तथा शारीरिक अवयवों की दृष्टि से विशाल एवं ठोस है किन्तु उसकी वेशभूषा रोमन है।
मथुरा शैली में आध्यात्मिक भावना को भी प्रदर्शित करने का प्रयत्न किया गया है। इस तरह मथुरा शैली में भाव, भावना तथा शारीरिक सौन्दर्य सभी को प्रदर्शित किया गया है।

इसलिए यह कला शैली धार्मिक विचार और शारीरिक सुख दोनों की अभिव्यक्ति का साधन बन सकी । पाश्चात्य विद्वानों का विचार है कि मथुरा शैली पर न केवल गान्धार कला का भाव है बल्कि उसका उद्भव भी गान्धार कला की अनुकृति से हुआ है। किन्तु इस कथन को अन्य विद्वान स्वीकार नहीं करते । जैसा कि एल्सिन महोदय ने लिखा है कि उसी समय समकालीन कला का एक विशुद्ध देशी सम्प्रदाय जिसका भरहुत और साँची से उद्भव हुआ था, मथुरा, भीटा, बेसनगर तथा अन्य केन्द्रों में प्रचलित था। पूर्व में यह प्रवृत्ति थी कि बुद्ध उहावीर और हिन्दू देवताओं की मूर्ति निर्माण के आविष्कार को विदेशी प्रभावों के कारण बताया जाता था परन्तु अब सामान्यतया इस बात पर विद्वान सहमत हैं कि इसका उद्भव मथुरा के देशी कलाकारों के द्वारा खोजा जाना चाहिए न कि गांधार के।


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