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                        ||  Veer Tejaji  ||

                              ||  वीर तेजाजी  ||







तेजाजी ने ग्यारवीं सदी में गायों की डाकुओं से रक्षा करने में अपने प्राण दांव पर लगा दिये थे। वे खरनाल गाँव के निवासी थे। भादो शुक्ला दशमी को तेजाजी का पूजन होता है। तेजाजी का भारत के जाटो में महत्वपूर्ण स्थान है। तेजाजी सत्यवादी और दिये हुये वचन पर अटल थे। उन्होंने अपने आत्म - बलिदान तथा सदाचारी जीवन से अमरत्व प्राप्त किया था। उन्होंने अपने धार्मिक विचारों से जनसाधारण को सद्मार्ग पर चलने के लिए प्रेरित किया और जनसेवा के कारण निष्ठा अर्जित की। जात - पांत की बुराइयों पर रोक लगाई। शुद्रों को मंदिरों में प्रवेश दिलाया। पुरोहितों के आडंबरों का विरोध किया। तेजाजी के मंदिरों में निम्न वर्गों के लोग पुजारी का काम करते हैं। समाज सुधार का इतना पुराना कोई और उदाहरण नहीं है। उन्होंने जनसाधारण के हृदय में सनातन धर्म के प्रति लुप्त विश्वास को पुन: जागृत किया। इस प्रकार तेजाजी ने अपने सद्कार्यों एवं प्रवचनों से जन - साधारण में नवचेतना जागृत की, लोगों की जात - पांत में आस्था कम हो गई। कलयुग में कर्म, शक्ति, भक्ति व वैराग्य का एक साथ समायोजन दुनिया में सिर्फ वीर तेजाजी के जीवन में ही देखने को मिलता हैं |




तेजाजी का हळसौतिया:-

जेठ के महिने के अंत में तेज बारिश होगई। तेजाजी की माँ कहती है जा बेटा हळसौतिया तुम्हारे हाथ से कर
-गाज्यौ-गाज्यौ जेठ'र आषाढ़ कँवर तेजा रॅ
लगतो ही गाज्यौ रॅ सावण-भादवो
सूतो-सूतो सुख भर नींद कँवर तेजा रॅ
थारोड़ा साथिड़ा बीजँ बाजरो।

सूर्योदय से पहले ही तेजाजी बैल, हल, बीजणा, पिराणी लेकर खेत जाते हैं और स्यावड़ माता का नाम लेकर बाजरा बीजना शुरू किया 

-उठ्यो-उठ्यो पौर के तड़कॅ कुँवर तेजा रॅ
माथॅ तो बांध्यो हो धौळो पोतियो
हाथ लियो हळियो पिराणी कँवर 
तेजा रॅबॅल्यां तो समदायर घर सूं 
नीसर्योकाँकड़ धरती जाय निवारी
 कुँवर तेजा रॅस्यावड़ नॅ मनावॅ बेटो जाटको।
भरी-भरी बीस हळायां कुँवर तेजा रॅ
धोळी रॅ दुपहरी हळियो ढाबियो
धोरां-धोरां जाय निवार्यो कुँवर तेजा रॅ
बारह रॅ कोसां री बा'ई आवड़ी।।


तेजाजी का भाभी से संवाद:-



नियत समय के उपरांत तेजाजी की 

भाभी छाक (रोटियां) लेकरआई। 
तेजाजी बोले-बैल्या भूखा रात का 
बिना कलेवे तेज।भावज
 थासूं विनती कठै लगाई जेज।।

देवर तेजाजी के गुस्से को भावज 
झेल नहीं पाई और काम से भी पीड़ित थी, 
उसने चिढने के लहजे में कहा-मण 
पिस्यो मण पोयो कँवर तेजा 
रॅमण को रान्यो खाटो खीचड़ो।
लीलण खातर दल्यो दाणों कँवर 
तेजा रॅसाथै तो ल्याई भातो निरणी।
दौड़ी लारॅ की लारॅ आई कँवर तेजा 
रॅम्हारा गीगा न छोड़ आई झूलै रोवतो।
ऐहड़ा कांई भूख भूखा कँवर तेजा रॅथारी 
तो परण्योड़ी बैठी बाप कॅ

भाभी का जवाब तेजाजी के कले 
जे में चुभ गया। तेजाजी नें रास और 
पुराणी फैंकदी और ससुराल जाने की 
कसम खा बैठे-ऐ सम्हाळो थारी रास पुराणी 
भाभी म्हारा ओअब म्हे तो प्रभात जास्यां 
सासरॅहरिया-हरिया थे घास चरल्यो बैलां 
म्हारा ओपाणिड़ो पीवो नॅ थे गैण तळाव रो।






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