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Tuesday, January 5, 2021

1या करें, मन नहीं मानता

1या करें, मन नहीं मानता

उस दिन अहोई अष्टïमी थी। राधा सुबह से ही व्रत रख के तरह-तरह के पकवान बनाने में लगी थी। कुछ देर बाद थक कर उसने अपनी बेटी को मदद करने के लिए आवाज दी। १४ साल की उसकी बेटी ने तमक कर जवाब दिया, ‘अपने जिन बेटों के लिए व्रत रखा है, उनसे मदद 1यों नहीं लेतीं?’

राधा मन मसोस कर रह गई।

वह 1या करे? जैसी परंपरा है, वही तो वह निभाएगी। बचपन से उसने अपनी मां, ताई, चाची आदि को बेटों और पति के लिए ही व्रत रखते देखा है। वह भी तो ऐसे ही अपनी मां से सवाल करती थी कि मां उसके लिए व्रत 1यों नहीं रखतीं? 1या वे उसका भला नहीं चाहतीं? कभी मां चुप रह जातीं, कभी डांट देतीं, तो कभी कह देतीं कि बेटों से वंश चलता है। बेटे बुढ़ापे में हमारा ध्यान रखेंगे। तुम तो शादी करके ससुराल चली जाओगी। राधा भुनभुनाती रह जाती। यह अलग बात है कि पढ़-लिख कर उसके भाई तो अमेरिका चले गए। वही साल में एक-दो चक्कर लगा कर मां-पिता जी को देख आती है।

कई बार उसके मन में सवाल उठता है कि मां को बेटों के लिए व्रत रखने का कितना फायदा हुआ? और अब वह 1यों सिर्फ लकीर पीटने के लिए उनकी ही तरह व्रत रख रही है? बिटिया के मन को दुखी करने का 1या फायदा? बेटों की तरह ही बेटी को भी वह बहुत प्यार करती है। बेटी पढ़े-लिखे, कुछ बन कर दिखाए, उसकी उम्र लंबी हो, वह हमेशा सुखी रहे, यही तो चाहती है वह। तो सिर्फ बेटों के नाम पर ही व्रत 1यों रखे? 1यों जो बात बचपन से उसके मन में कसक बन कर चुभती रही है, उसे विरासत में अपनी बेटी को दे? परंपरा का पालन करना अपनी जगह ठीक है, मगर समय के साथ उसमें, हमारे विचारों में, हमारे जीवन में बदलाव भी तो आते हैं।

राधा ने जैसे ही यह फैसला किया, उसके मन की गुत्थियां सुलझती चली गईं। उसने तुरंत बेटी को बुला कर कहा कि अब से मैं सारे व्रत सभी बच्चों के लिए, उनकी लंबी उम्र, अच्छे भविष्य व खुशहाली के लिए रखूंगी। बेटी के चेहरे पर आ गई भोली मुसकराहट को देख कर राधा को लगा उसका व्रत सफल हो गया।

1यों न आप भी अपने व्रतों में, अपनी दुआओं में अपनी प्यारी बिटिया को शामिल कर लें? आप भी खुश रहेंगी, आपकी बेटी भी।

अब नन्हीं नहीं रही बिटिया

अकसर नौ-दस साल की उम्र से बच्चियों में कुछ खास हार्माेन बनने लगते हैं, जिससे शरीर के कई अन्य अंगों का विकास शुरू हो जाता है। १६-१७ साल की उम्र तक यह विकास पूर्ण हो जाता है और आपकी नन्ही बिटिया युवती बन जाती है।

माहवारी नारी शरीर में होनेवाला यह सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण परिवर्तन है।

इसमें बच्ची के शरीर के अंदरूनी और बाह्यï जननांगों का विकास प्रारंभ होता है, जो लगभग १८-१९ साल की उम्र में पूरा होता है। इसके बाद ही मां बनना एक स्त्री के स्वास्थ्य के लिए ठीक होता है। आमतौर पर माहवारी शुरू होने की औसत उम्र १३-१४ साल है। लेकिन आजकल १० साल की उम्र में भी माहवारी शुरू होने के मामले सामने आने लगे हैं।

क्रैंप: कुछ किशोरियों को माहवारी के कुछ दिनों पहले से ही सिरदर्द, कमरदर्द, जी मिचलाना, स्तनों में दर्द या सूजन, मानसिक तनाव और डिप्रेशन आदि की शिकायत होती है। कई बार चक्कर या ठंडा पसीना भी आता है। माहवारी संबंधी तकलीफों के लिए होमियोपैथी में अच्छा इलाज है। ऐसी स्थिति में बिटिया को दर्द की अंधाधुंध दवाएं खिलाने की जगह किसी अच्छे डॉ1टर को दिखाएं।

अनियमित माहवारी: किशोरावस्था में माहवारी अकसर अनियमित रहती है। कभी तो यह अपने नियमित समय के बाद में तो कभी समय से पहले हो जाती है। परंतु यह समस्या धीरे धीरे अपने आप ठीक हो जाती है। मां को चाहिए कि बेटी को इस्तेमाल के लिए किसी अच्छी कंपनी का साफ नैपकिन दें। उसे नैपकिन के इस्तेमाल का सही तरीका बताएं। तीन-चार घंटे बाद बदलने का निर्देश दें। साथ ही व्यक्तिगत साफ सफाई को भी समझाएं। आवश्यक हो, तो बिटिया की समस्या को डॉ1टर को दिखाएं।

माहवारी को ले कर अनेक किस्म की भ्रांतियां जुड़ी हुई हैं। हमारे समाज में इस दौरान अचार नहीं छूना चाहिए, रसोई में नहीं जाना चाहिए जैसी कई हास्यास्पद हरकतें की जाती हैं। इसकी वजह से बच्चियां कुंठाग्रस्त और हीनभावना की शिकार होती हैं। अपनी बिटिया को समझाएं और आप भी समझें, कि यह एक सहज, सामान्य प्राकृतिक प्रक्रिया है।

वक्षस्थल का विकास: दस-साढ़े दस साल की उम्र से बच्चियों के वक्ष का विकास आरंभ हो जाता है। इसी उम्र के आसपास बिटिया के शरीर में इस्ट्रोजन नाम का हार्माेन बनने लगता है। इस्ट्रोजन वक्षस्थल के विकास में सहायक होता है। स्तनों का विकास प्राय: अच्छे खानपान पर निर्भर करता है। १३-१४ साल की उम्र में या स्तनों की वृद्घि के अनुरूप बिटिया के लिए ब्रा ले आएं।

इस्ट्रोजन नारी शरीर को आकार देने में मु2य भूमिका निभाता है। यह ओवरी (डिंब ग्रंथियां), गर्भाशय और योनि के विकास में सहायक होता है। ११ से १३ साल की उम्र के बीच स्तनों और कूल्हों की मांसपेशियां विकसित होती हैं। माताओं को चाहिए कि बच्ची को नहाने के बाद रोज शरीर पर बेबी लोशन या मॉइश्चराइजर लगाने के लिए कहें, इससे त्वचा पर खिंचाव के निशान नहीं पड़ेंगे।

मुंहासे: किशोरावस्था में हार्माेनल बदलाव के कारण मुंहासे निकलना एक आम समस्या है। आमतौर पर माहवारी के आसपास मुंहासे ज्यादा निकलने लगते हैं। बिटिया को कहें कि अपनी त्वचा की सफाई पर ध्यान दे। यदि जरूरी हो, तो किसी त्वचा रोग विशेषज्ञ को दिखाएं।

एनोरे1िसया नरवोसा: आजकल किशोरियों के मन में पतलेपन की चाह ने एक बीमारी का रूप ले लिया है। इस उम्र में शरीर का सबसे ज्यादा विकास होता है, जिसके लिए बच्चों को पर्याप्त पोषण की आवश्यकता होती है। लेकिन खाने-पीने में अनावश्यक कटौती करके वे अपने लिए परेशानी पैदा कर लेती हैं। वजन कम होने से वे बीमार पड़ जाती हैं। कई बार इससे माहवारी भी रुक जाती है। इस स्थिति से बचने के लिए माताओं को बेटी की डाइट पर नजर रखनी चाहिए।

मानसिक बदलाव: किशोरावस्था में शुरू हो गए शारीरिक परिवर्तन के साथ ही बच्चियों की मनोस्थिति में भी बदलाव आने लगता है। कुछ बच्चियां इन परिवर्तनों से घबरा जाती हैं, तो कुछ कुंठाग्रस्त हो जाती हैं, कुछ झिझक के कारण अपने व्यक्तित्व को समेट लेती हैं। शरीर में हो रहे परिवर्तनों को ले कर बच्चियों के मन एक किस्म का रोमांच-सा होता है। वे अपने शरीर को देखना, समझना चाहती हैं। बार-बार शीशे के सामने खड़े हो कर खुद को निहारना उन्हें भाने लगता है। इसमें कोई बुराई नहीं है। इसके लिए टोकते समय माताओं को संयम बरतना चाहिए। यह उम्र बहुत नाजुक होती है। उसे बिना जाहिर किए किसी दूसरे काम में व्यस्त कर दें।

से1सुअलिटी: हारमोनल परिवर्तन के कारण बच्चियों को अपनी से1सुअलिटी महसूस करने का एक नया अनुभव होता है। पिछले कुछ सालों में टीनएज से1स और अबॉर्शन के मामलों में खासी बढ़ो8ारी हुई है। इसकी वजह फिल्में, बढ़ते विदेशी चैनलों का प्रभाव, खुलेपन की संस्कृति के साथ ही अन्य अनेक कारण हैं।

माताओं को चाहिए कि बेटियों को शरीर की जरूरतों और उसकी गरिमा के बारे में बताएं। यही वह समय है, जब माताएं उन्हें नपे-तुले श4दों में से1स एजुकेशन दे सकती हैं। उन्हें अपने सामाजिक मानदंडों, विवाह-संबंध की पवित्रता, गर्भवती होने के खतरे, शादी से पूर्व से1स की ओर समाज का नजरिया और सुरक्षित से1स के बारे में जरूर बता दें।


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