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Tuesday, January 5, 2021

आडवाणी-नीतीश नजदीकियों से परेशान

 आडवाणी-नीतीश नजदीकियों से परेशान

जद(यू) से एकजुटता की पहल पर भरोसा

कभी लालकृष्ण आडवाणी की कृपा के चलते नीतीश कुमार के हाथ से रेल मंत्रालय जाते-जाते बच गया लेकिन अब आडवाणी के विश्वासपात्र होने की छवि ही उनकी राह का रोड़ा बन रही है। बिहार में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में लोकजनश1ित पार्टी की अहमियत को देखते हुए नीतीश कुमार ने रामविलास पासवान से पुराने रिश्ते बहाल करने की पहल तो की है लेकिन पासवान नीतीश की इस पहल पर आडवाणी से उनकी निकटता को देखते हुए यकीन नहीं कर पा रहे हैं। पासवान फिलहाल इंतजार करो की रणनीति पर अमल कर रहे हैं जबकि दूसरी ओर जद (यू) के भीतर भाजपा से रिश्ते को लेकर अकुलाहट बढ़ती ही जा रही है।जद (यू) के सूत्रों के मुताबिक पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की मंशा चाहे जो हो लेकिन पार्टी के भीतर इस मसले को लेकर दबाव बढ़ता ही जा रहा है। दरअसल, भाजपा से रिश्ते पर पुनॢवचार को लेकर दबाव लोकसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद ही पडऩे लगा था। 

नतीजों की समीक्षा के बाद पार्टी नेतृत्व इस राय पर पहुंचा था कि भाजपा से रिश्ते के चलते जद (यू) से मुसलमान पूरी तरह छिटक गए और जब तक मुसलमानों का राजद को एकमुश्त समर्थन नहीं रुकता जद (यू) की हालत नहीं सुधर सकती। भाजपा से दूरी बनाने की जद (यू) की रणनीति का आधार यह है कि जद (यू) नेतृत्व यह मानकर चल रहा है कि बिहार के मुसलमानों का लालू प्रसाद से मोहभंग हो रहा है और यदि उनके सामने कोई दूसरा धर्मनिरपेक्ष विकल्प पेश किया जाता है तो वे राजद से मुंह मोड़ सकते हैं। बिहार की पूरी राजनीति फिलहाल ९ फीसदी मुसलिम वोट के ही इर्द-गिर्द चल रही है। राजद जहां मुसलिम और ११ फीसदी यादव वोट के आजमाए ‘माई’ समीकरण को फिर से आजमाने की तैयारी कर रहा है तो दूसरी ओर जनता दल (यू) मुसलिम वोट में सेंधमारी करने की कोशिश कर रहा है। इसी रणनीति के तहत जद (यू) धर्मनिरपेक्षता की जोर-जोर से दुहाई देने लगा है। पार्टी के नेता केसी त्यागी कहते हैं, ‘हम अब धर्मनिरपेक्षता को लेकर और नरम नहीं हो सकते हैं। भाजपा को तय करना होगा कि वह संघ से संचालित होगी या राजग से।

जद (यू) के लिए परेशानी का कारण यह है कि धर्मनिरपेक्षता को लेकर उसकी चिंता पर अब दूसरे राजनीतिक दल भरोसा नहीं कर रहे हैं

 भाजपा से रिश्ते को लेकर जद(यू) में बेचैनी

पार्टी अध्यक्ष जार्ज फर्नांडिस का ‘भाजपा प्रेम’ तो संशय का कारण है ही पासवान जैसे नेता नीतीश की मंशा पर भी यकीन नहीं कर पा रहे हैं। रेलवे जोन को लेकर ममता बनर्जी से झगड़े के दौरान नीतीश के संकटमोचक लालकृष्ण आडवाणी बने थे और गोधरा कांड में रेलवे की भूमिका लेकर भी नीतीश पर भाजपा को बचाने का आरोप लगता रहा है। आडवाणी अब भाजपा के नए अध्यक्ष हैं। सूत्रों का कहना है कि पासवान यह आश्वासन चाहते हैं कि यूपीए से संबंध तोडऩे की एवज में उन्हें सरकार बनने की स्थिति में मु2यमंत्री बनाया जाए। चर्चा यह भी है कि खुद नीतीश ने पासवान को मु2यमंत्री बनाने का प्रस्ताव इसलिए रखा है 1योंकि उन्हें भाजपा की ओर से शत्रुघ्न सिन्हा को मु2यमंत्री के उ6मीदवार के रूप में पेश करने की आशंका है।

जीना यहां मरना यहां

बानो ने एक तरह से सर्कस में ही अपनी जिंदगी गुजार दी है। वह इसी माहौल में पली-बढ़ी है। पिता को सर्कस में तरह-तरह के करतब करते हुए देखा करती थी। मां-बाप ने शादी भी सर्कस में कला का प्रदर्शन करने वाले से करा दी। अब तो उसकी २२ साल की बेटी रेशमा भी सर्कस में रिंग आफ डेथ (मृत्युचक्र) आदि खतरों से भरे कारनामे दिखाने लगी है। मां-बेटी दोनों को खतरों से खेलनेे की आदत-सी हो गई है। हो भी 1यों न! सर्कस उनके खून में रच-बस जो गया है। मां-बेटी को बंजारों की जिंदगी ही असली जिंदगी लगती है। साल में एकाध बार अपने गांव बंगलौर चली जाती हैं, पर मन इसी सर्कस में रमा रहता है। बानो बताती हैं, ‘घर में दिल नहीं लगता है। ऐसा महसूस होता है, मानो जिंदगी में खालीपन-सा आ गया हो।

घरों से दूर, धंधे की मजबूरी उनके दिल के डोर को बांधे रखती है। फिर यही जीवन रास आने लगता है। स्त्री-पुरुष कलाकार एक-दूसरे का हाथ थाम लेते हैं और घर बसा लेते हैं। इस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह अंतहीन क्रम बन जाता है।

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