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Tuesday, January 5, 2021

शोले फिल्म देखी, तो हेमा मालिनी की दीवानी हो गई

 शोले फिल्म देखी, तो हेमा मालिनी की दीवानी हो गई

युक्रेन की रहने वाली हैं मरीना कुरनिलोविच। इसके बावजूद वह भरतनाट्यम की एक कुशल नृत्यांगना हैं। उनके परिवार में दूर-दूर तक किसी का कला से कोई नाता नहीं रहा है। फिर भी नृत्य के प्रति मरीना की रुचि और लगन उन्हें भारत खींच लाई। अर्थशास्त्री मां और इंजीनियर पिता की जुड़वां पुत्रियों में से एक हैं मरीना।

बचपन से ही भारत के प्रति मरीना का काफी लगाव रहा है। हिंदी फिल्मों की वह बेहद शौकीन रही हैं। वह बताती हैं, ‘जब मैं छोटी थी, तो हिंदी फिल्में, उनकी नायिकाओं के श्रृंगार और नृत्य मुझे इतने प्रिय लगते थे कि मैं उन्हें देखने का कोई भी मौका नहीं गंवाती थी। तेरह वर्ष की उम्र में मैंने शोले फिल्म देखी, तो हेमा मालिनी की दीवानी हो गई। फिर तो उनके कपड़े से लेकर बोलचाल तथा हर चीज की मैं नकल करने लगी।’

नृत्य के प्रति आपका लगाव कैसे हुआ? मरीना कहती हैं कि हिंदी फिल्में देखकर ही मुझे नृत्य का शौक हुआ। फिल्मों में देखी नृत्य भंगिमाओं का अ5यास मैं घंटों शीशे के सामने खड़ी होकर करती थी। तब मन में एक ही विचार हमेशा आता था कि काश, मैं किसी भारतीय गुरु से नृत्य सीख पाती!

भारत आने के बारे में वह बताती हैं, ‘युक्रेन में मैं स्वनिॢमत नृत्य करती थी। मेरे माता-पिता भी मुझे सदैव प्रोत्साहित करते रहते थे। विश्वविालय की शिक्षा समाप्त करते-करते मेरी अपनी नृत्य मंडली ‘लक्ष्मी’ नाम से स्थापित हो चुकी थी। भारतीय नृत्य उत्सव में खजुराहो पर प्रस्तुत हमारी नृत्य नाटिका के लिए हमें प्रथम पुरस्कार मिला। तभी मुझे पता चला कि भारत में नृत्य सीखने के लिए भारत सरकार विदेशी छात्रों को छात्रवृ8िा देती है। मैंने अनमने ढंग से दूतावास को फॉर्म भेज दिया। जब मेरे चयन की सूचना मुझे मिली, तो मैं खुशी से झूम उठी। इस तरह नृत्य सीखने मैं भारत आ गई।’

फिलहाल मरीना गुरु सरोजाजी से भरतनाट्यम, कर्नाटक शास्त्रीय संगीत और मृदंगम की शिक्षा ग्रहण कर रही हैं। भरतनाट्यम में पूरी तरह पारंगत होना चाहती हैं वह। मरीना ने नृत्य में अरंगेत्रम पूरा कर लिया है। जब छुट्टियों में वह युक्रेन जाती हैं, तो वहां अपनी शिष्याओं को भी भरतनाट्यम की शिक्षा देती हैं। उन्होंने हिंदी और तमिल भी सीख ली है। गुरुजी की किताब का उन्होंने रूसी में अनुवाद किया है।

३४ वर्षीया मरीना ने अब तक शादी नहीं की है। इसका कारण बताते हुए वह कहती हैं, ‘अपने नृत्य में मैं उसी तरह खोई रही, जैसे कृष्ण में मीरा।’ पर नृत्य की ऊंचाइयों को छूने के बाद अब मरीना किसी ऐसे हमसफर की तलाश में हैं, जो उनके साथ-साथ उनके नृत्य को भी अपनाए और प्यार करे।

महिला अधिकारों के प्रति भी मरीना काफी सजग हैं। भरतनाट्यम में आकंठ डूबी इस विदेशी नृत्यांगना का कहना है कि विवाह के बाद पति को पत्नी के कार्यों का स6मान करना चाहिए और पत्नी को भी परिवार के साथ-साथ अपने कैरियर पर भी ध्यान देना चाहिए। विवाह के बाद खासकर किसी कलाकार की कला का तो बिलकुल ही हनन नहीं होना चाहिए।

न सिर्फ भरतनाट्यम, बल्कि भारतीय संस्कृति भी मरीना को काफी पसंद है। खासकर यहां के पारिवारिक मूल्यों से वह काफी प्रभावित हैं। वह कहती हैं, ‘मेरी हाॢदक इच्छा है कि मैं भारतीय संस्कृति के गुण और शास्त्रीय नृत्य युक्रेन की छात्राओं को बांटूं।’

पंडवानी की महारानी तीजन बाई

उस दिन ‘दिल्ली हाट’ के रंगस्थल में तीजन अपने पूरे रंग में थीं। हाथ में त6बूरा लिए तीजन मंच पर भीम बनी हैं। जोरदार आवाज में ललकारती हैं - दुर्योधन! इसी के साथ ढोलक की जबरदस्त थाप गूंजती है। और थाप की ताल से ताल मिलाती हुई एक और आवाज का विस्फोट होता है - ऐइच्छा। यह पंडवानी (कपालिक) शैली तीजन का खास अंदाज है।

इस अद्भुत अंदाज में ही तीजन पांडवों की पूरी कथा सुनाती हैं। अब भीम हैं, तो दो मिनट बाद ही दुर्योधन या द्रौपदी। जैसे ही रोल बदलता है, तीजन के हाव-भाव बदल जाते हैं। आवाज का उतार-चढ़ाव भी उसी के हिसाब से होता जाता है। चलने, मुडऩे और बोलने के अपने इसी अनूठे अंदाज से तीजन आज देश ही नहीं, विदेशों में भी नाम कमा चुकी हैं। ठेठ छ8ाीसगढ़ी अंदाज में उन्होंने पांडवों की पूरी गाथा चार जनवरी को दिल्ली हाट में सुनाई।

छ8ाीसगढ़ के दुर्ग जिले के अटारी (पाटन) गांव की मूल निवासी तीजन एक खांटी देसी परिवार से हैं। किसी का भी कला से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं रहा। चटाई-झाड़ू बनाना उनके घर वालों का खानदानी पेशा था। पर तीजन की इस काम में जरा भी दिलचस्पी नहीं थी। उनका मन तो बचपन से ही गायकी में रमता था। तीजन ने कभी किसी गुरु से गाना नहीं सीखा। न ही कार्यक्रम देने के लिए कभी अ5यास किया। वह कहती हैं, ‘मंच पर कार्यक्रम शुरू कर देने के बाद मुझे खुद-ब-खुद गाना आने लगता है। वैसे गाना चाहूं, तो शायद ठीक से न गा सकूं।’ मंच पर गाने की शुरुआत के बारे में वह बताती हैं, ‘मैं यूं ही गुनगुनाती रहती थी। फिर गांव के लोगों को लगा कि गा सकती हूं, तो उन्होंने मुझे मंच पर खड़ा कर दिया। लोगों को मेरा गाना पसंद आने लगा।’

तीजन ने गायन की शुरुआत छ8ाीसगढ़ी गीत - सुवा, पडक़ी, कर्मा, ददरिया और बांस गीत वगैरह से की। अपने नाना बृजलाल पारधी से पांडवों की कहानी सुनने के बाद उन्होंने अपने गायन की नई शैली विकसित की ‘पंडवानी’ (कपालिक)। इस शैली में पहली बार १३ साल की उम्र में उन्होंने अपने जिले के चंदखुरा गांव में कार्यक्रम दिया।

छ8ाीसगढ़ के अटारी से शुरू हुआ तीजन की कला का यह सफर फ्रांस, स्विट्जरलैंड, जर्मनी, साइप्रस, तुर्की, इटली, ट्यूनीसिया, मॉरिशस आदि अनेक देशों तक पहुंच चुका है। तीजन को १९८८ में पद्मश्री से स6मानित किया गया। संगीत-नाटक अकादमी, महिला नवरत्न, गुरु-शिष्य परंपरा, शिरोमणि देवी अहिल्या आदि अनेक स6मानों से भी इन्हें नवाजा जा चुका है। तीजन भिलाई इस्पात संयंत्र के सांस्कृतिक विभाग में काम करती हैं।

इस शोहरत का श्रेय तीजन अपने प्रशंसकों को देती हैं। उनका कहना है, ‘मैं जहां कहीं भी गई, मुझे सभी लोगों का आशीर्वाद मिला, दर्शकों का खूब प्यार मिला।’ उनका विश्वास है कि यह कला उनके बाद भी अच्छी तरह विकसित होती रहेगी।

महिलाओं के लिए तीजन का संदेश है कि वे अपने पैरों पर खड़ा होने की कोशिश करें। तभी पुरुषों की गुलामी के बंधन टूट सकते हैं। वह कहती हैं, ‘हर व1त पुरुषों के ही बंधन में 1यों रहें महिलाएं? हमें भी तो आजाद रहने का हक मिलना चाहिए।’

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