Ads Here

Tuesday, January 5, 2021

अकलमंद और मूर्ख

 अकलमंद और मूर्ख

एक लालाजी थे। बहुत ही अकलमंद। अपनी ससुराल जा रहे थे। उनके घर के पास ही एक मूर्ख रहता था। उसे जब यह पता लगा कि लालाजी अपनी ससुराल जा रहे हैं, तो वह उनके पास आया और बोला, ‘लालाजी, कहिए तो मैं भी आपकी ससुराल घूम आऊं!’

लालाजी यह तो जानते ही थे कि वह मूर्ख है। सफर भी लंबा था। तिस पर अकेले जाना उन्हें भी जंच नहीं रहा था। सो उन्होंने मन में सोचा, ‘एक से भले दो’ और वे उसे अपने साथ ले जाने के लिए राजी हो गए।

मूर्ख बहुत खुश हुआ। रास्ते के खर्च के लिए उसने एक रुपया लिया और अपनी पगड़ी के अंदर छुपा लिया। उधर लालाजी ने भी पूरी तैयारी की और मूर्ख को साथ लेकर ससुराल के लिए चल पड़े। रास्ते में दिन छिप गया। चारों ओर अंधेरा फैल गया।

लालाजी का साथी मूर्ख डरपोक भी था। उसने उनसे कहा, ‘लालाजी, अब रात हो गई है। आगे जाना ठीक नहीं। मैं तो यहीं ठहरूंगा!’

‘थोड़ा और आगे बढ़ो। गांव कुछ ही दूर रह गया है। वहीं चलकर ठहरेंगे। यहां वीरान जंगल में रुकना उचित नहीं। कहीं चोर-डाकू आकर लूट न लें।’ लालाजी ने उसको समझाया।

पर वह न माना। बोला, ‘नहीं, अब तो मैं एक कदम भी आगे नहीं चलंूगा’ और अपनी चादर रास्ते में बिछाकर लेट गया।

लालाजी अब 1या करते? साथ उसे ले ही आए थे। उसे छोडक़र जा भी नहीं सकते थे। मन मारकर वहीं रुक गए। पर, उनके पास काफी सामान था। लूट जाने का भय भी उन्हें सता रहा था। तभी उन्होंने देखा कि सामने फूस का ढेर पड़ा हुआ है। उनके दिमाग ने काम किया। वह अपने सामान के साथ उसी फूस में छिपकर लेट गए।

काफी समय बाद कुछ चोर उधर से निकले। चोरों ने देखा कि रास्ते में कुछ पड़ा है। उन्होंने सोचा लकड़ी का कुंदा होगा पर असल में वहां मूर्ख सोया हुआ था।

एक चोर ने ऐसे ही कहा, ‘लोग भी कितने मूर्ख होते हैं। रास्ते में ल1कड़ डाल देते हैं। यह भी नहीं सोचते कि रात-बिरात कोई आदमी इधर से निकलेगा, तो उसे चोट लग सकती है।’

मूर्ख जाग रहा था। उसने चोर की यह बात सुनी, तो उससे रहा न गया। मूर्ख जो ठहरा। झट से बोला, ‘तुम सब के सब उल्लू हो! आदमी को ल1कड़ बताते हो।’

चोरों ने यह सुना, तो सकते में आ गए। अभी तक वे जिसे लकड़ी का कुंदा समझ रहे थे, वास्तव में वह आदमी निकला। फिर उसकी बेढंगी बात। उन्हें गुस्सा आ गया। सभी चोर मिलकर उसकी पिटाई करने लगे।

वह चिल्लाया, ‘भइया! सब जगह मार लो, लेकिन सिर पर न मारना। पगड़ी में एक रुपया है। कहीं गिर न जाए।’

चोरों ने उसकी यह बात सुनी, तो उन्हें बड़ी हंसी आई। आपस में बोले, ‘अच्छे मूर्ख से पाला पड़ा है।’ लेकिन वे सभी अपनी उत्सुकता दबा न सके। उन्होंने उसकी पगड़ी खोली, तो उसमें से सचमुच एक रुपये का सि1का निकला। वे सभी सि1के को देखकर मुसकराने लगे।

तभी मूर्ख बोला, ‘भइया! यदि तु6हें रुपये के खरे होने में जरा भी संदेह हो, तो फूस के ढेर में मेरा साथी लेटा है, उसे जगाकर पूछ लो।’

अब चोरों ने फूस के ढेर को हटाया। उसमें मय सामान के लालाजी थे। चोरों को तो मुंहमांगी मुराद मिल गई। उन्होंने लालाजी की भी डटकर मर6मत की और सारा सामान लेकर चंपत हो गए। इस प्रकार मूर्खको साथी बनाकर अकलमंद लालाजी ने अपना सारा धन गंवा दिया।

जीना यहां मरना यहां

बानो ने एक तरह से सर्कस में ही अपनी जिंदगी गुजार दी है। वह इसी माहौल में पली-बढ़ी है। पिता को सर्कस में तरह-तरह के करतब करते हुए देखा करती थी। मां-बाप ने शादी भी सर्कस में कला का प्रदर्शन करने वाले से करा दी। अब तो उसकी २२ साल की बेटी रेशमा भी सर्कस में रिंग आफ डेथ (मृत्युचक्र) आदि खतरों से भरे कारनामे दिखाने लगी है। मां-बेटी दोनों को खतरों से खेलनेे की आदत-सी हो गई है। हो भी 1यों न! सर्कस उनके खून में रच-बस जो गया है। मां-बेटी को बंजारों की जिंदगी ही असली जिंदगी लगती है। साल में एकाध बार अपने गांव बंगलौर चली जाती हैं, पर मन इसी सर्कस में रमा रहता है। बानो बताती हैं, ‘घर में दिल नहीं लगता है। ऐसा महसूस होता है, मानो जिंदगी में खालीपन-सा आ गया हो।

दिल्ली के नजफगढ़ में पिछले दिनों रशियन कोमल सर्कस लगा हुआ था। यह सर्कस एक शहर से दूसरे शहर और एक प्रदेश से दूसरे प्रदेश जा कर शो करता है। एक शहर से दूसरे शहर या फिर दूसरे राज्य में जाने पर सर्कस वाले सारा ताम-झाम समेट कर गाडिय़ों से पूरे कारवां के साथ चलते हैं। अगर पड़ाव किसी दूर प्रदेश का है, तो पूरे काफिले का खर्च लाखों में होता है। इस तरह सर्कस में काम करने वाले लोग मजबूरी में एक तरह से खानाबदोश-सी जिंदगी बसर करते हैं। उनकी रोजी-रोटी का साधन जो यही है।

इनका स्थायी ठौर-ठिकाना नहीं होता। आज यहां, तो कल न जाने कहां? घरों से दूर, धंधे की मजबूरी उनके दिल के डोर को बांधे रखती है। फिर यही जीवन रास आने लगता है। स्त्री-पुरुष कलाकार एक-दूसरे का हाथ थाम लेते हैं और घर बसा लेते हैं। इस तरह पीढ़ी-दर-पीढ़ी यह अंतहीन सिलसिला बन जाता है।

कुछ ऐसी ही कहानी नेपाल की लक्ष्मी की है। गरीबी उसे भारत के सर्कस में खींच लाई। सर्कस में काम करते-करते वह उ8ाम की ओर आकर्षित हो गई। इन दोनों ने शादी कर ली। उ8ाम हवाई झूला और फायर डांस जैसे जोखिम भरे करतब दिखाता है और पश्चिम बंगाल के पुरुलिया जिले का रहनेवाला है। इनके अब दो बच्चे हैं। लक्ष्मी नहीं चाहती कि उसके बच्चे उसकी ही तरह सर्कस में काम करें।

No comments:

Post a Comment