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Tuesday, January 5, 2021

नेपाली लड़कियां सर्कस में

 नेपाली लड़कियां सर्कस में

सर्कस का हर शो तीन घंटे का होता है। सामने से देखने पर सर्कस बहुत ही व्यवस्थित नजर आता है, लेकिन सर्कस के मंच के पीछे गड़े तंबुओं में ताक-झांक करने पर उनकी जिंदगी की असलियत उजागर होती है। टेंटनुमा घरों में टीवी, फ्रिज, बेड आदि को देख कर एक छोटे से घर का अहसास होता है। उसी टेंट में बंधा पमेरियन कु8ाा रहे-सहे घर के माहौल की कमी पूरी कर देता है। टेंट के बाहर खेल रहे छोटे बच्चे भी रस्सी को पकड़ कर कलाबाजियां लगाते हुए नजर आते हैं। एक छोटे नेपाली बच्चे से पूछने पर उसने बहुत ही सहजता से जवाब दिया, ‘मां भी तो सर्कस में यही सब करती हैं।’ सर्कस में बानो की ही तरह ऐसी कई अन्य लड़कियां थीं, जिनके मां या पिता पहले सर्कस में थे। एक तरह से यह उनका यह पुश्तैनी व्यवसाय हो गया है।

सर्कस में काम करने वाली लड़कियां कुछ खास पढ़ी-लिखी नहीं होती हैं। इसके ढाई-दो सौ के स्टाफ में २५-३० लड़कियां होती हैं। उनमें भी अधिकतर लड़कियां नेपाल के हेटौंडा जिले की हैं। गरीबी की शिकार इस जिले की अकसर १०-१२ लड़कियां झुंड में भारत के सर्कसों में चली आती हैं। उन्हें इस सर्कस में मिलता भी 1या है? मात्र दो या तीन हजार रुपये। नेपाली लड़कियां इस सर्कस में ही नहीं, बल्कि अन्य सर्कसों में भी देखने को मिल जाएंगी। पहले सर्कस में केरल की लड़कियों की भरमार हुआ करती थी। अब इनकी सं2या दाल में नमक के बराबर रह गई है। इसके कई कारण हो सकते हैं। सबसे बड़ा कारण केरल में साक्षरता के दर में वृद्धि होना है। शिक्षा ग्रहण करने के बाद लड़कियों का रुझान सर्कस के बजाय नर्सिंग व्यवसाय की ओर ज्यादा है।

रशियन कोमल सर्कस में वार्डन की हैसियत से काम करने वाली धनलक्ष्मी केरल के तेलीचेरी इलाके से हैं। तेलीचेरी में ही सर्कस सीखने का स्कूल कल्लरी यानी कि अखाड़ा है। धनलक्ष्मी को सर्कस में काम करने का खासा अनुभव है। वे बताती हैं, ‘देश में सर्कस वास्तव में केरल की ही देन है।’ जैसे-जैसे समय बदलता गया, सर्कस का स्वरूप भी बदलता गया। दर्शकों के मनोरंजन के लिए उनकी पसंद को प्राथमिकता दी गई। काफी समय तक नटों की तरह ‘बार’ पर तरह-तरह की करतबों की महारत हासिल करने पर जोर दिया जाता था। कभी पलटी, वेट लि3िटंग, एलीफेंट पासिंग जैसे आइटमों का दौर था। लेकिन अब रिंग ऑफ डेथ, डेंटल, 3लाइंग ट्रेपीज जैसे जोखिम भरे करतबों का दौर जोर पकड़े हुए है।

बदली हवा का असर ड्रेस पर

बदले जमाने का असर सर्कस में काम करने वाली महिलाओं की ड्रेस पर भी पड़ा है। पहले लड़कियां स्लै1स पहन कर अपने आइटम किया करती थीं। धीरे-धीरे स्लै1स की लंबाई घटती चली गयी। अब तो छोटी कसी हुई फ्रिलवाली फ्रॉक या फिर छोटे स्कर्ट-4लाउज में अधिकतर आइटम दिखाए जाते हैं। यह ड्रेस पिछले काफी समय से चलन में है। धनलक्ष्मी कहती हैं, ‘1या करें, हवा ही कुछ ऐसी है।’

कभी सर्कस का बहुत क्रेज था। गांवों में लगने वाले मेलों की जान सर्कस हुआ करता था। परिवार के परिवार बैल गाडिय़ों, इक्कों में बैठ कर वहां उमड़े चले आते थे। सर्कस में शेर, रीछ जैसे तरह-तरह के जानवरों के साथ तरह-तरह के करतब दिखाए जाते थे। बच्चों को जानवरों के प्रति खास मोह होने के कारण सर्कस देखने अच्छी-खासी भीड़ जुट जाया करती थी। लेकिन अब सर्कस में पहले वाली बात नहीं रही। जानवरों पर होने वाले अत्याचारों को मद्देनजर रखते हुए इन्हें सर्कस शो में दिखाए जाने पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। हालांकि कु छ सर्कस वालों ने उच्चतम न्यायालय से स्थगन आदेश भी लिया है। इसके बावजूद पशुओं पर कथित अत्याचार होने की बात को ले कर संबद्ध विभाग के कर्मचारी आ धमकते हैं और परेशान करते हैं। रशियन कोमल सर्क स के डाइरे1टर सतीश शर्मा बताते हैं, ‘इसी वजह से हमने अपने शेर और रीछ बंगलौर के चिडिय़ाघर में भेज दिए हैं।’ इससे सर्कस शो से होने वाली आय काफी कम हो गई है। हालांकि दर्शकों को रिझाने के लिए टिकट सस्ते कर दिए हैं और रिंग के करतब दिखाने के लिए रूस, उज्बेकिस्तान जैसे देशों के कई आर्टिस्ट के नायाब प्रदर्शन भी प्रस्तुत किए जाते हैं। फिर भी मंदी यथावत बनी हुई है। सर्कस के डाइरे1टर और मैनेजर ने पीड़ा भरे स्वर में बताया, ‘अगर यही परिस्थितियां बनी रहीं, तो सर्कस एक अतीत की चीज बन कर रह जाएगा।’

अतीत की सैर कराएगा ‘यादों का सफर’

ब्रिटिश राज के वैभव की यादें ताजा करेगा हिमाचल पर्यटन विभाग

कालका-शिमला रेलमार्ग के सौवें वर्ष पर हिमाचल पर्यटन विभाग लोगों में अतीत प्रेम जगाने की कोशिश में है। पर्यटकों को अतीत की सैर कराने के इस टूरिज्म प्रोजै1ट का नाम ‘यादों का सफर’ रखा गया है। यादों के इस सफर में शिमला में ब्रिटिश राज के वैभव को धरती पर उतारने की कोशिश की जाएगी। हाथ से चलने वाले रि1शे, फौजी बैंडों की धुनें और राष्ट्रीय स्तर का फुटबाल टूर्नामेंट जैसे कई कार्यक्रमों के जरिए आजादी से पहले और फौरन बाद के शिमला को पर्यटकों के सामने परोसा जाएगा।इसमें ब्रिटिश राज का वैभव तो होगा ही, साथ ही महात्मा गांधी और पं. नेहरू की शिमला की ऐतिहासिक यात्राओं की झांकियां भी होंगी। लाट साहब के निवास ‘वायस रीगल लॉज’ के ब्रिटिशकालीन वैभव पर ‘लाइट एंड साउंड सिस्टम’ के जरिए रोशनी डाली जाएगी। पुरानी यादों को ताजा करने वाली अतीत की इन झांकियों के जरिए पर्यटन विभाग को उ6मीद है कि प्रदेश में पर्यटन को नई र3तार मिलेगी।

नौ नवंबर, १९०३ से अपनी यात्रा शुरू करने वाले कालका-शिमला रेलमार्ग का यह सौंवा वर्ष है। हिमाचल पर्यटन विभाग एक सदी में आने वाले इस मौके को पर्यटकों को लुभाने वाली ‘इवेंट’ बनाने की कोशिश में है। इसके लिए शिमला के ब्रिटिशकालीन जनजीवन की झांकियां पर्यटकों के सामने परोसी जाएंगी। अंगरेजों की लाड़ली इस नगरी के ब्रिटिश राज के वैभव को धरती पर उतारने की कवायदों का खुलासा पर्यटन मंत्री विजय सिंह मनकोटिया ने किया। उन्होंने बताया कि पर्यटन विभाग कालका शिमला रेल मार्ग के सौवें वर्ष के मौके पर ९ नवंबर के आसपास तीन-चार दिन का समारोह करेगा। ब्रिटिशकालीन शिमला की यादें ताजा करने को जहां रिज पर घोड़े चलाने वालों को पुरानी पोशाकों में पेश किया जाएगा वहीं तीनों सेनाओं से इस मौके पर फौजी बैंड भेजने का आग्रह किया जाएगा। शिमला में तब हाथ से चलने वाले रि1शा भी माल पर उतारे जाएंगे।

डूरंड कप की जन्मस्थली होने के कारण इस वर्ष राष्ट्रीय स्तर का एक फुटबॉल टूर्नामेंट भी शिमला में कराया जाएगा। दुनिया के सबसे पुराने थियेटरों में शुमार गेयटी में कुछ पुराने और नए नाटकों का मंचन करने के लिए पृथ्वी थिएटर सहित देश की नामी गिरामी नाट्य संस्थाओं व निर्देशकों से आग्रह किया जाएगा। उनका कहना है कि वायस रीगल लॉज पर साउंड व लाइट सिस्टम से इसकी अद्भुत स्थापत्य कला को आकर्षक रूप में पेश किया जाएगा। इस मौके पर देश के सबसे ऊंचे क्रिकेट मैदान चायल में देश की विश्वकप क्रिकेट टीम को न्योता जाएगा।


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