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Tuesday, January 5, 2021

फिशर प्राइस का मैग्ना डूडल

 मां का दूध शिशु के लिए सर्वो8ाम है। मां का दूध फ्रिज में २४ घंटे और बाहर छह घंटे तक सुरक्षित रहता है। आजकल बोतल से दूध पिलाने को मेडिकल में एकदम नकार दिया गया है। जहां तक संभव हो, कटोरी-च6मच से ही दूध पिलाएं।

शिशु को हर दो घंटे में दूध पिलाएं और इससे पहले अपने हाथ धोना न भूलें। शिशु को शौच के बाद धुलाते समय ध्यान रखें कि उसे रगड़ न लगेे। शिशु की नैपी ध्यान से बदलें। नैपी तथा अन्य कपड़े गरम पानी में दो बूंद डेटॉल डाल कर धोएं। शिशु किसी भी मौसम में पैदा हुआ हो, उसे लपेट कर रखें। यदि शिशु कमजोर है, तो इसका खास 2ायाल रखें। वरना वह हाइपोथरमिया का शिकार हो सकता है, यानी उसके शरीर का तापमान गिर सकता है, जो खतरनाक हो सकता है। बच्चे की तबीयत ठीक नहीं है, तो डॉ1टर के पास ले जाएं, अपने मन से दवा न दें।

फिशर प्राइस का मैग्ना डूडल

फिशर प्राइस नाम से छोटे बच्चों के खिलौने बनाने वाली कंपनी मैटल ट्वायस प्राइवेट लिमिटेड ने तीन साल से ऊपर के बच्चों के लिए मैग्ना डूडल्स नामक एक चुंबकीय ड्रॉइंग बोर्ड बाजार में पेश किया है। इससे खेलना बहुत ही आसान है। इस बोर्ड की सतह चुंबकीय है और इसके साथ एक चुंबकीय कलम के अलावा छह शेप स्टा6पर्स भी हैं, जिनकी मदद से बच्चे कुछ भी लिख व बना सकते हैं।

डूडल केसाथ एक मैजिकल इरेजर भी है, जिसकी मदद से स्क्रीन को साफ किया जा सकता है। इसकी कीमत एक हजार ५९९ रुपये है।

ए1शन के हलके 3लॉटर्स

ए1शन समूह ने बदलते समय केसाथ ग्राहकों की बदलती आवश्यकताओं के मद्देनजर हलके 3लॉटर्स बाजार में उतारे हैं। कंपनी का कहना है कि इन्हें बनाने में ईवीए तकनीक का इस्तेमाल किया गया है, जिस कारण पहनने पर ये अत्यंत आरामदेह तथा कोमल लगते हैं। आकर्षक रंगों व डिजाइनों में उपल4ध इन 3लॉटर्स की कीमत १२५ रुपये से १६५ रुपये रखी गई है।

महिलाओं के लिए स्त्रीकल्प

आयुर्वेदिक उत्पाद बनाने वाली कंपनी सूर्या हर्बल ने महिलाओं के लिए स्त्रीकल्प नामक एक खास सीरप बाजार में उतारा है। कंपनी का दावा है कि जड़ी-बूटियों व धातुओं के मिश्रण से तैयार स्त्रीकल्प के सेवन से न केवल महिलाओं में ऊर्जा का संचार होता है, बल्कि मासिक धर्म शुरू होने से पूर्व होने वाली घबराहट, पीठ दर्द चिड़चिड़ापन भी दूर होता है। स्त्रीकल्प में अनंत मूल के अलावा अशोक छाल, लोधरा, शतावर, कशिश भस्म आदि का इस्तेमाल किया गया है। यह २०० मिलीलीटर की बोतल में ६८ रुपये मूल्य पर उपल4ध है।

प्रिंस के प्लास्टिक कंटेनर

प्रिंस प्लास्टि1स इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड ने घरेलू उपयोग की खातिर प्लास्टिक कंटेनर की नई रेंज सील एन स्टोर बाजार में उतारी है। ये गोल और चौकोर के अलावा माप के मुताबिक आठ साइजों में उपल4ध हैं। इस रेंज में ०.११ से साढ़े पांच लीटर क्षमता तक के आठ कंटेनर शामिल हैं। कंपनी का कहना है कि ये पूरी तरह एयरटाइट व उ8ाम कोटि के प्लास्टिक से बनाए गए हैं। इनकी कीमत २५ रुपये से ९५ रुपये के बीच है।

बस के लायक भी पैसे नहीं होते थे : किरण सहगल

प्रसिद्ध ओडिसी नृत्यांगना किरण सहगल का कहना है, ‘इनसानियत का एहसास होना किसी भी व्य1ित के लिए बहुत जरूरी है। अगर व्य1ित इसे भूल जाता है, तो उसे इनसान कहलाने का ही हक नहीं है।’ किरण के अनुसार, व्य1ित चित्रकारी, गायन, लेखन, अभिनय, नृत्य आदि चाहे किसी भी क्षेत्र में अपना कैरियर बनाए, लेकिन सबसेपहले उसे एक अच्छा इनसान होना चाहिए।

ओडिसी नृत्य में किरण के उत्कृष्ट योगदान को देखते हुए उन्हें २००१ में पद्मश्री से भी स6मानित किया जा चुका है।

किरण को बचपन से ही कला का माहौल मिला। वह थिएटर और फिल्म की जानी-मानी अभिनेत्री जोहरा सहगल की बेटी हैं। ऐसे में भला उनकी रुचि कला में कैसे न होती। बचपन से ही वह अभिनय करती रहीं तथा साथ ही ओडिसी नृत्य भी सीखती रहीं। यह अलग बात है कि एक नृत्यांगना के रूप में ही उनकी पहचान बनी।

मुंबई में जन्मीं किरण को इस शहर से बेहद लगाव है। वह कहती हैं, ‘मुंबई में मैंने बचपन गुजारा है। मुझे याद है कि हमारी ही बिल्ंिडग में मशहूर अभिनेता देवानंद और उनके भाई चेतन आनंद रहते थे। अकसर मैं उनसे मिलने जाया करती थी।’

किरण की स्कूली शिक्षा मुंबई के सेंट जोसफ कॉन्वेंट स्कूल और अलीगढ़ मुसलिम गल्र्स स्कूल में हुई। कॉलेज की पढ़ाई दिल्ली के लेडी श्रीराम कॉलेज में शुरू तो हुई, लेकिन पढ़ाई बीच में ही छोड़ देनी पड़ी। इस संबंध में किरण कहती हैं, ‘दरअसल जब मैं लेडी श्रीराम कॉलेज में थी, उसी दौरान १९६२ में चीन के साथ भारत की लड़ाई शुरू हो गई। तब मां ने घबराकर मुझे लंदन बुलवा लिया और न चाहते हुए भी मुझे लंदन जाना पड़ा।’ किरण ने अपनी बाकी शिक्षा लंदन में ही पूरी की।

अब तक अमेरिका, इंग्लैंड, फ्रांस, पाकिस्तान, जर्मनी, नार्वे सहित कई देशों में किरण ओडिसी नृत्य पेश कर चुकी हैं। आज किरण की गिनती ओडिसी की चुनिंदा नृत्यांगनाओं में की जाती है।

किरण अपनी मां जोहरा सहगल को ही अपना गुरु मानती हैं। इस संबंध में वह बताती हैं, ‘नृत्य की शुरुआती जानकारी मैंने अपनी मां से ही ली है। यह बात उन दिनों की है, जब मां पृथ्वी थिएटर में डांस डाइरे1टर थीं। नाटकों के दौरान मैं भी मां के साथ ही रहती थी, जिन्हें देख-देख कर ही मैंने नृत्य की थोड़ी बहुत जानकारी प्राप्त कर ली थी। मेरी लगन देखकर मां ने मुझे बहुत प्रोत्साहित किया।’

किरण आज जिस मुकाम पर हैं, वहां पहुंचने के लिए उन्हें काफी संघर्ष करना पड़ा है। वह बताती हैं, ‘जब मैं दिल्ली में थी, तो मेरे पर्स में सिर्फ बस से घर आने तक के ही पैसे होते थे। कई बार ऐसा भी हुआ कि पानी पीने की इच्छा हुई, पर यह सोचकर संतोष करना पड़ा कि घर कैसे जाऊंगी। पर संघर्ष से ही सफलता मिलती है, व्य1ितत्व निखरता है।’

बेहद मिलनसार किरण हमेशा मुसकराती रहती हैं। न तो उन्हें अपनी सफलता का घमंड है और न ही अपनी पारिवारिक विरासत का। उनसे मिलकर ऐसा महसूस ही नहीं होता है कि वह इतनी बड़ी नृत्यांगना हैं।

किरण को सर्वाधिक खुशी तब मिलती है, जब उनका पूरा परिवार इकटï्ठा होता है। ऐसा लगता है, मानो कई कलाएं एक जगह आकर मिल गई हों। अभिनय में मां जोहरा सहगल, नृत्य में खुद किरण सहगल, चित्रकारी और गायन में बेटी सुजाता और नृत्य में ही उनकी आठ वर्षीया पोती मध्यमा - वाकई सभी एक से बढक़र एक हैं।

शास्त्रीय नृत्य चाहे कोई भी हो, उसके भविष्य को लेकर किरण काफी उत्साहित हैं। वह बताती हैं, ‘भारतीय शास्त्रीय नृत्य अब देश की सीमाओं से आगे विदेशों में भी अपनी पहचान बनाने लगे हैं। भविष्य में ये नृत्य और भी लोकप्रिय होंगे।’

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